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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 728

अमृत भी निछावर करना । ऐसा ख्र सुनही है स्त्रीके बिना ।
करता है ऐसा उसका मन । निश्चय पार्थ ॥ ३५ ॥
फिर भी भोगके कारण । दौडते हैं तीनों भवन ।
दस दिशाओंमें अर्जुन । उसके परे भी ॥ ३६ ॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥ १२ ॥
सुख-भोगके लिये पापसे धन-संचय—
आमिष कौरकी बडी आशासे । न सोच निगलता मीन जैसे ।
होती है विषयाशा उन्हे वैसे । पांडुकुमार ॥ ३७ ॥
नहीं होती कभी वांछित प्राप्ति । किंतु करोडोंकी आशा-संतति ।
बढ़ते बढ़ते है वह होती । कोश-कीटक ॥ ३८ ॥
तथा फैलाते जो अभिलाश । पूर्ण न होता बनता द्वेष ।
ऐसा काम-क्रोध ही विशेष । बनता पुरुषार्थ ॥ ३९ ॥
दिनमें चलना रातमें जागना । जैसे होता चौकीदारका जीना ।
दिन-राति विश्रांति नहीं जाना । उसी भांति ॥ ३४० ॥
ऊंची चोटीसे काम है ढकेलता । नीचे क्रोध पत्थरपे पटकता ।
फिर भी राग-द्वेष नहीं छूटता । विषयोंसे उसका ॥ ४१ ॥
हृदयमें ऐसे विषयोंकी भूख । जुटाये विषय-साधन अनेक ।
भोगके लिये जो अति आवश्यक । किंतु द्रव्य है कहां ॥ ४२ ॥
तभी भोग-पूर्तिमें हो आसक्त । जुट जाते हैं धन-संचयार्थ ।
तथा लूटते हैं विश्वको नित । मनमाने जो ॥ ४३ ॥
एकको मारते समय साधकर । तो दूसरेका सर्वस्व ही छीनकर ।
तीसरेके लिये बनाते हैं आखर । अपाय तंत्र ॥ ४४ ॥
आशाके कसके पाश डूबे हैं काम-क्रोधमें ।
चाहते सुख-भोगार्थ पापसे धन-संचय ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६५१