ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथा ये जो दूसरी । संपदा है आसुरी ।
मोह-लोहकी खरी । सांखली है ॥ ६६ ॥
यह सुन कर तू अर्जुन । भय खायेगा अपने मन ।
किंतु कभी रातसे क्या दिन । भय खाता है ॥ ६७ ॥
जो है यह आसुरी संपत्ति । उसीका बंधन हो सकती ।
आश्रित होती जिनकी मति । इन दोषोंकी ॥ ६८ ॥
किंतु यहां तू अर्जुन । उपरोक्त दैवी गुण ।
लेकर आया निधान । जन्मसे ही ॥ ६९ ॥
इसीलिये तू यहांका । स्वामी दैवी-संपदाका ।
बन, पायेगा मोक्षका । सुख शाश्वत ॥ २७० ॥
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥
अनादिसे ये दो मार्ग चले आये हैं—
ऐसे देव और असुर । संपदाके स्वामी जो नर ।
अनादिसे हैं चलकर । आये दो मार्ग ॥ ७१ ॥
जैसे है रातका अवसर । करते निशाचर व्यापार ।
तथा दिनमें सुव्यवहार । मनुष्यादिक ॥ ७२ ॥
वैसे ही अपना आचरण । करती है दोनों सृष्टि जान ।
दैवी तथा आसुरी अर्जुन । जन्म लेकर ॥ ७३ ॥
वैसे भी दैवी सविस्तृत । ज्ञान कथनमें पार्थ ।
कहा है मैंने यथावत । पीछे ही सब ॥ ७४ ॥
जीवोंकी सृष्टि दो भांति दैवी तथैव आसुरी ।
सविस्तार कही दैवी आसुरी कहता सुन ॥ ६ ॥
६४९ देवासुर-संपद्विभाग-योग