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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 720

इन छह दोषोंसे संपूर्ण । बनाया है आसुरी भवन ।
इसलिये अल्प न अर्जुन । आसुरी संपदा ॥ ५६ ॥
या क्रूर ग्रहोंका मिलन । होता एक राशिमें जान ।
या निंदकके पास पूर्ण । आते सब पाप ॥ ५७ ॥
या मरनेवालेके अंग । ग्रासते जैसे सभी रोग ।
या कुसमयमें दुर्योग । होते एकत्र ॥ ५८ ॥
या जीवन समाप्तिकी आती बेला । बकरीको डसता बिच्छू काला ।
वैसे ये छ ही दोष जिसे सकल । घेरते हैं ॥ ५९ ॥
विश्वासु जैसे चोरसे पकड़वाता । या थका हुवा महापूरमें फंसता ।
वैसे ही इन दोषोंसे अनिष्ट होता । मनुष्यका सदैव ॥ २६० ॥
यदि किसी मोक्ष-पथिक पर । इनका पडा इक छींटा भर ।
डुबाएगा उसे भव-सागर । न उठेगा वह ॥ ६१ ॥
उतरके अधम योनिकी । सीढी परसे जो अंतिमकी ।
स्थावर तक गति उसकी । पहुंचेगी ही ॥ ६२ ॥
छ दोष ये जिनमें । पाये जाते उनमें ।
बढ़ती संपदामें । आसुरी जो ॥ ६३ ॥
ऐसे हैं ये भिन्न । संपदा तू जान ।
कही स-लक्षण । तुझसे अब ॥ ६४ ॥
दैवी संपद्विमोक्षाय निबंधायासुरी मता ।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पांडव ॥ ५ ॥
तू दैवी संपत्तिका स्वामी है—
इन दोनोंमें पहली । दैवी संपदा जो भली ।
मोक्ष-सूर्यसे उजली । प्रभात जान ॥ ६५ ॥
मुक्तता करती दैवी आसुरी बांधती जहां ।
पायी है संपदा तूने दैवी न कर सोच तू ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६४८