ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआसुरी संपदाका वर्णन—
अब जो मैं आसुरी सृष्टि । तथा वहांकी सभी गोष्ठी ।
कहता हूं दे पूर्ण दृष्टि । अवधानकी ॥ ७५ ॥
जैसे है बिन वाद्यका नाद । नहीं आता कोई भी साद ।
या बिन पुष्पका सुगंध । नहीं आता वैसे ॥ ७६ ॥
वैसे ही प्रकृति यह असुर । अकेली नहीं होती है गोचर ।
जब मिलता एकाधा शरीर । दीखती वह ॥ ७७ ॥
करनेसे जैसे घर्षण । देती लकड़ी अग्नि कण ।
प्राणि देहसे निर्माण । होता है इसका ॥ ७८ ॥
बढता है जैसे ऊस । वैसे ही बढता है रस ।
देहाकार होता वैसा । प्राणियोंका ॥ ७९ ॥
अब जैसे जिनका तन । रूप लेता जाता अर्जुन ।
होती है दोष वृद्धि जान । आसुरी जो ॥ २८० ॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥
कृत्याकृत्यका अज्ञान—
तथा पुण्यके लिये हो प्रवृत्ति । या पापके विषयमें निवृत्ति ।
जाननेमें इसको है विरक्ति । होती मनमें ॥ ८१ ॥
अजी ! आने जाने में रखना भी द्वार । घर बांधनेके नशेमें भूल कर ।
मर जाता है घरमें ही फंस कर । कोशकीट जैसे ॥ ८२ ॥
दी हुई पूंजी आयेगी या नहीं । यह भी जो कभी देखता नहीं ।
और देता है चोरको वैसी ही । पूंजी मूर्ख ॥ ८३ ॥
तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति । नहीं जानती आसुरी-वृत्ति ।
स्वप्नमें भी शुचिताकी रीति । जानते नहीं ॥ ८४ ॥
कृत्य अकृत्य क्या कैसे न जाने आसुरी जन ।
न स्वच्छता न आचार जानते वे न सत्य भी ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ६५०