ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानवोंमें उसको अधम जान । कठोरताका ही जो अवतरण ।
सुन तू अब कहता हूं लक्षण । अज्ञानका मैं ॥ ४५ ॥
६ आसुरी-भाव, अज्ञान—
शीत उष्णादि स्पर्श जैसे । न जानता पाषाण वैसे ।
या रात्र और दिवससे । अनभिज्ञ जात्यंध ॥ ४६ ॥
उठता अग्नि जैसे खाता । खाद्याखाद्य नहीं जानता ।
या पारस नहीं जानता । लोह या सोना ॥ ४७ ॥
या नाना रसोंमें जैसे । डूबती कड़ची जैसे ।
किंतु रसास्वाद ऐसे । जानती नहीं ॥ ४८ ॥
अथवा जैसे वायु होता । मार्गामार्ग नहीं जानता ।
वैसे कृत्याकृत्यमें होता । वह अंधा ॥ ४९ ॥
जैसे यह स्वच्छ है मैला । यह नहीं जानता बाल ।
जिसे देखता वह केवल । डालता मुखमें ॥ २५० ॥
खिचडी कर वैसे पाप-पुण्यकी । खाते हुए नहीं बुद्धिमें उसकी ।
भला बुरा यह नहीं जाननेकी । ऐसी जो दशा ॥ ५१ ॥
उसका नाम है अज्ञान । इस बोलसे नहीं भिन्न ।
ऐसे छ दोषोंका लक्षण । कहे सब ॥ ५२ ॥
आसुरी संपदा जीवन विनाशक होती है—
ऐसे छ दोषोंसे भरकर पूर्ण । आसुरी संपदा हुई बलवान ।
छोटीसी शुभांगीमें जैसे अर्जुन । हो विषय अतिशय ॥ ५३ ॥
अथवा तीन अग्निकी पंक्ती । देखनेमें छोटीसी लगती ।
किंतु है विश्वकी प्राणाहूती । ओछी उसको ॥ ५४ ॥
या विधाताको जाकर शरण । त्रिदोषसे न चुकता मरण ।
उन तीनोंके ये दूने हैं जान । छह दोष ॥ ५५ ॥
६४७ दैवासुर-संपद्विभाग-योग