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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 716, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 716

आसुरी-गुणोंकी ओर संकेत—
दुःख क्लेशकी जो पुष्ट लता । दोष-कांटोंसे भरी है पार्थ ।
वह अपनी व्याख्यामें लाता । आसुरी जो ॥ १३ ॥
त्याज्यको तजनेके हित । जान लेता है उपयुक्त ।
इसीलिये दे तू स्व-चित्त । सुननेमें यह ॥ १४ ॥
यह है नरक-व्यथा घोर । लाये दोष अति भयंकर ।
एकत्र किये हैं ये असुर- । संपदा रूप ॥ १५ ॥
नाना विष वर्गका कर गठन । बनाया जाता कालकूट महान ।
वैसे सभी दोषोंका कर मिलन । बनी आसुरी संपदा ॥ १६ ॥
दंभो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानंचाभिमानस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥ ४ ॥
१ आसुरी-गुण, दंभ—
आसुरी दोषमें ख्यात । गर्जेके जिसका पार्थ ।
नाम चलता सतत । दंभ ऐसा ॥ १७ ॥
अपनी जननी है पावन । रहती जो तीर्थके समान ।
किंतु जनमें करना नग्न । पतन कारण होता ॥ १८ ॥
या विद्या गुरुपदेशमें प्राप्त । चौराहे पर किया प्रदर्शित ।
इच्छा भी होती अनिष्ट हेत । वैसे ही जो ॥ १९ ॥
डूबनेको महा-पूरमें । पहुंचाती पैल तीरमें ।
वह नाव बांधे शिरमें । डुबो देती है ॥ २२० ॥
जीवनका जो साधन । अधिक खाया तो अन्न ।
वही जीवनीय अन्न । होता है विष ॥ २१ ॥
वैसे ही दृश्य-अदृश्यका मित्र । तारक होता है धर्म सर्वत्र ।
प्रसिद्ध करनेसे जो सर्वत्र । शत्रु बन जाता ॥ २२ ॥
अहंता दंभ अज्ञान क्रोध दर्प कठोरता ।
आया जो गुण ये लेके आसुरी संपदा वह ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६४४

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