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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 717

तमी वाचाके चौराहे पर । फैलाया तो धर्मका विस्तार ।
कहलाता दंभ धनुर्धर । अधर्म-रूप ॥ २३ ॥
२ आसुरी-गुण, दर्प—
किंतु मूर्खकी जिव्हा पर । फैलाया तो धर्मका विस्तार ।
कहलाता दंभ धनुर्धर । वह ब्रह्म सभाको ॥ २४ ॥
या घोड़ा जो भादुरी लोगोंका । ओछा मानता गज इंद्रका ।
गिरगिट जो कांटों परका । स्वर्ग भी बौना ॥ २५ ॥
या तृणका जो ईंधन । भड़कता है गगन ।
डबरे बसा मीन । माने सिंधु तुच्छ ॥ २६ ॥
फूलता है वह क्षीधन । विद्या स्तुति पाकर मान ।
एक दिनका ही पराश्न । फुलाता अल्पको जैसे ॥ २७ ॥
जैसे मेघ छाया देख तोड़ता । दुर्दैवी घरका आसरा पार्था ।
मृग-जल देखकर तोड़ता । पानीका डबरा ॥ २८ ॥
और कहूं मैं कितना । संपत्ति-योगसे नाना ।
मदमें उन्मत्त होना । कहलाता दर्प ॥ २९ ॥
३ आसुरी-गुण, अभिमान—
तथा वेदमें जिसका विश्वास । विश्वका पूजनीय ईश ।
विश्वमें एक ही महा तेजस । सूर्य मात्र ॥ २३० ॥
विश्वमें जो है स्पर्धास्पद । एक ही सार्वभौम पद ।
न मरना है निर्विवाद । विश्वको भाता ॥ ३१ ॥
इसीलिये यदि उत्साहसे । इसका वर्णन करनेसे
फूलता वह अभिमानसे । तथा रखता डाह ॥ ३२ ॥
कहता निकालूंगा ईशको । गरल पिलाऊंगा वेदको ।
खपाता है अपने बलको । स्व-गौरवार्थ ॥ ३३ ॥
६४५ देवासुर-संपद्विभाग-योग