ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे वह दिवस-राति । करते सबकी उन्नति ।
चलता आत्म-हित-रति । धनुर्धर ॥ २ ॥
केवल अपने हितार्थ । प्राणियोंका अहित पार्थ ।
मनमें भी लाना किंचित । नहीं कभी ॥ ३ ॥
अद्रोहत्वकी ऐसी गोष्ठी । कही मैंने तुझे किरीटी ।
मानो वह प्रत्यक्ष दृष्टी । देखती है ॥ ४ ॥
२६ दैवी-गुण, अमानित्व—
गंगा जैसे चढके शंभुके माथ । आप हुई अपनेमें संकुचित ।
वैसे सन्मानसे भी करें प्रतीत । लज्जा आप ॥ ५ ॥
वह अमानित्व कहलाता । तुझसे पहले जो कहा था ।
वही वही कहना क्या पार्थ । बार बार ॥ ६ ॥
दैवी-गुणोंकी महानता—
ऐसे ये गुण हैं जो छब्बीस । ब्रह्मेश्चर्य करता निवास ।
मोक्ष-चक्रवर्तिका है खास । अग्रहार ॥ ७ ॥
ऐसी नाना संपदा दैवी । गुण-तीर्थकी नित्य-नवी ।
निरिच्छ सगरोंकी दैवी- । गंगा बह आयी ॥ ८ ॥
या गुण-पुष्पकी वरमाला । लेकर आयी है मुक्ता बाला ।
निरिच्छ विरक्तका है गला । खोजती है ॥ ९ ॥
अथवा छब्बीस गुणोंकी ज्योती । उजलाकर ले यह आरती ।
उतारने आयी गीता खोजती । पति आत्माको ॥ २१० ॥
उगलते हैं जो निर्मल । इन गुणोंके मुक्ता-फल ।
दैवी श्रियाके शुक्तावळ । गीतार्णवमें जो ॥ ११ ॥
कितना करूं इसका वर्णन । कहे हैं स्पष्ट होंगे ऐसे गुण ।
इन गुण-राशिका है दर्शन । दैवी श्रियाका रूप ॥ १२ ॥
६४३ देवासुर-संपद्विभाग-योग