ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 698, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजी प्रबोधके माथे पर । सोऽहंताका मध्यान्ह आकर ।
आत्म-भ्रांति छाया जो सत्वर । छिपती पदतलमें ॥ १० ॥
तब विश्व-स्वप्न सहित । अन्यथा मति जो निद्रित ।
न रहती जब माया रात । सम्हालेगा कौन ॥ ११ ॥
तभी अद्वय-बोध-पुरमें अति । महदानंदकी भीडभाड होती ।
फिर सुखानुभूतिकी उतरती । बात लेनदेनकी ॥ १२ ॥
अथवा माना सदा ऐसा । मुक्त-कैवल्य सुदिवस ।
देता है सदैव प्रकाश । उदयसे उसके ॥ १३ ॥
निज-धाम-व्योमका राव । उदित रहता सदैव ।
उदयास्त दिशाका ठाव । मिटाता है वह ॥ १४ ॥
न दीखना दीखने सह मिटाता । दोनोंसे ढका हुवा जो उजलाता ।
उसका प्रातःकाल ही भिन्न होता । अवर्णनीय ॥ १५ ॥
दिन-रातके जो उस पार । प्रकाश रूप ज्ञान-भास्कर ।
दीप्ति बिन दीप्ति है अपार । देखता कौन ॥ १६ ॥
मौन छोडकर गुरु-गुण-वर्णनके लिये क्षमा याचना—
श्रीनिवृत्ति वह चित्सूर्य । नमन उसे स-विनय ।
बाधक है स्तवन-कार्य । शाब्दिक जो यहां ॥ १७ ॥
गुरु-देवकी महिमा देखकर । स्तवन करना हो यदि सुंदर ।
गुरु-चरणमें लीन हो तत्पर । स्तव्य-बुद्धिसे ॥ १८ ॥
न जानते जो सब जानते । मौन निगल बखाने जाते ।
कुछ भी न होनेसे हैं आते । अपने यहां जो ॥ १९ ॥
तेरी स्तुतिमें होना जिसे तत्पर । पश्यंति मध्यमाको निगलकर ।
होती है परा सह वैखरी फिर । जहां विलय ॥ २० ॥
एसे तुझमें सेवकपनमें । शब्द-स्तोत्र-भूषण चढानेमें ।
यह सहनकर कहनेमें- । भी न्यून अद्वयानंद ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ६२६