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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 697

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दैवासुर-संपद्विभाग-योग
चित्सूर्य श्रीगुरु वंदन-
मिटाते हुये विश्वका आभास । उदित हुआ विस्मित चंडांश ।
अद्वय-कमलिनीका विकास । नमन करें अब ॥ १ ॥
अविद्या-तम जो दूर करता । ज्ञानाज्ञान तारोंको निगलता ।
ज्ञानियोंका है सुदिन करता । स्वबोधका ॥ २ ॥
जिससे उदित होते ही दिन । खुलके आत्म-ज्ञानके नयन ।
तजता है जीव-पक्षी अर्जुन । देहभावका घोंसला ॥ ३ ॥
लिंग-देह कमल मध्यमें । फंसा चिद्भ्रमर बद्धतामें ।
बंध-मोक्ष होता है प्रकाशमें । उसके उदयसे ॥ ४ ॥
सिकुडे पथमें शष्प-शब्दोंके । दोनों किनारोंमें भेद-नदीके ।
चीखते हैं पागल विरहके । बुद्धि औ' बोध ॥ ५ ॥
उन चक्रवाकोंका मिथुन । समरसका जो समाधान ।
प्रतीत करता चिद्गगन । भुवनका दीप ॥ ६ ॥
जिसके उदयका प्रातःकाल । मिटाता है भेद-चोरका काल ।
आत्मानुभव-पथिक सकल । चलते योगी ॥ ७ ॥
जिसके विवेक-किरण संग । उन्मेष-सूर्यकांतके स्फुलिंग ।
जला देता है अरण्य-विभाग । संसारके ॥ ८ ॥
रश्मि-पुंज जिसका अति प्रखर । होते ही स्वरूप ऊसरमें स्थिर ।
आता वहां महा सिद्धियोंका पूर । मृगजलका ॥ ९ ॥
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