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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 699

किंतु रंकने देखा अमृत सागर । तब जो उचितानुचित भूलकर ।
दौडा करने उसका पाहुनाचार । लेकर साग-पात ॥ २२ ॥
यहां साग-पात ही बहुत कहना । उसके हर्ष-वेगपर ध्यान देना ।
दीपसे सूर्यकी आरती उतारना । यहां देखना भक्ति ॥ २३ ॥
बालक यदि उचित जानता । उसका बालपन क्या रहता ।
किंतु होती है जो उसकी माता । तोषती बहू ॥ २४ ॥
गांवकी गंदगीसे भरा जो नीर । आता है सिर पर पैर देकर ।
तब कहती क्या गंगा हठो दूर । उससे कभी ॥ २५ ॥
अजी ! कैसा था भृगुका अपाचार । उसको मानकर प्रियोपचार ।
तब की हरिने संतुष्ट होकर । गुरुकी पाद्य-पूजा ॥ २६ ॥
आता जब गगन तमसे भर । सूर्यके सम्मुख तब देखकर ।
कहता है क्या भास्कर “तू हो दूर ।” कभी ऐसे ॥ २७ ॥
वैसे भेद-बुद्धिकी तुला पर । सूर्योपमाके शब्द डालकर ।
तोला है जो मैंने श्रीगुरुवर । सहन करें स्वामी ॥ २८ ॥
देखा जिन्होंने ध्यान-चक्षुसे । वर्णन किया है वेद-काव्यसे ।
वह सब क्षमा किया जैसे । मुझे भी क्षमा कर ॥ २९ ॥
किंतु आज मैं तेरे गुणगानमें । ललचाया दोष न मान मनमें ।
न उठूंगा कभी मैं अर्थ-तृप्तिमें । कुछ भी हो फिर ॥ ३० ॥
जन्म-जन्मांतरके सत्य-वचन-तपका फल है यह गीतार्थ —
गीताके नामसे तेरा सतत । सेवन करता प्रसादमृत ।
तभी वर्णन किया है ईप्सित । दैवसे मिला दूना ॥ ३१ ॥
किया सत्य-वचनका तप । मेरी वाणीने अनेक कल्प ।
उस फलका है महा-दीप । मिला यह स्वामी ॥ ३२ ॥
पुण्य-पोषण किया असाधारण । उससे ही हुवा तेरा गुण-वर्णन ।
यह फल देकर हुए उऋण । आज वे स्वामी ॥ ३३ ॥
६२७ दैवासुर-संपद्विभाग-योग