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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 695

किंतु क्या बोलूं यह गीता । मेरी ज्ञानकी है जो लता ।
जानता जो इसे समस्त । होता मुक्त मोहसे ॥ ८३ ॥
सेवन की अमृत सरिता । रोग गंवाकर पांडुसुत ।
अमरपन यह उचित । देती जैसे ॥ ८४ ॥
वैसे ही जाननेसे यह गीता । निर्मोह होना विस्मय क्या पार्थ ।
अपने आत्म-ज्ञानमें होना रत । होता सरल ॥ ८५ ॥
जिस आत्म-ज्ञानके स्थान । कर्म जो अपना जीवन ।
लय कर होगा अर्जुन । ऋण-मुक्त ॥ ८६ ॥
खोया हुआ दिखा कर जैसा । मार्ग जाता है वीर-विलास ।
ज्ञान बनता कलश वैसा । कर्म-प्रासादका ॥ ८७ ॥
इसीलिये ज्ञानी पुरुष । कर्म करता है निःशेष ।
बोलता अनाथोंका सखा । इस प्रकार ॥ ८८ ॥
इस गीता-ज्ञानकी परंपरा—
यह श्रीकृष्ण वचन-अमृत । न समानेसे छलकाता पार्थ ।
तब हुई हे व्यास कृपा प्राप्त । संजयको यहां ॥ ८९ ॥
उसने धृतराष्ट्रको दिया । धृतराष्ट्रसे पान कराया ।
इसीलिये जीवांत भया । उसका सरल ॥ ५९० ॥
आया गीता श्रवण अवसर । लगा उसको नहीं अधिकार ।
किंतु जीवनांत समय पर । उससे मिला प्रकाश ॥ ९१ ॥
द्राक्षा-लतामें दूध डाला जाता । व्यर्थ गया यह ऐसा दीखता ।
फल पाकमें वह दूना होता । जिस प्रकार ॥ ९२ ॥
वैसे हरिमुखके अक्षर । संजयने कहे स-आदर ।
उससे अंध स-अवसर । हुवा दुखी ॥ ९३ ॥
उसकी कर देश-भाषा रचना । उसको ऐसी वैसी कर सजना ।
सुना दिया उसे मैंने जैसे वह जाना । श्रीचरणोंमें ॥ ९४ ॥
६२३ पुरुषोत्तमयोग