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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 694

यह शब्द-ब्रह्मका नवनीत है—
जबसे किया कहना प्रारंभ । अब तक सब शाखावलंब ।
कहा है उपनिषद सौरभ । कमलका मान ॥ ७१ ॥
यह शब्द-ब्रह्मका मथित । तथा व्यास प्रज्ञाके है हाथ ।
मंथन कर जो नवनीत । सार लिया हमने ॥ ७२ ॥
ज्ञानामृतकी है जो जान्हवी । आनंद-चंद्रकी सत्रहवी ।
विचार क्षीरार्णवकी नवी । लक्ष्मी है यह ॥ ७३ ॥
तभी अपनी पद-वर्णसे । अर्थके यह जीव प्राणसे ।
मुझे छोड़ न जानती जैसे । महालक्ष्मी जो ॥ ७४ ॥
सम्मुख आया जब क्षराक्षरत्व । न कहा तब उनका पुरुषत्व ।
तथा समर्पण किया है सर्वस्व । मुझ पुरुषोत्तममें ॥ ७५ ॥
इसीलिये विश्वमें गीता । मुझ आत्मकी पतिव्रता ।
यह जो अब तू सुनता । इस समय ॥ ७६ ॥
सच बोलना तो यह नहीं शास्त्र । संसार जीतनेका है महाशस्त्र ।
तथा है आत्म अवतारका मंत्र । इन अक्षरोंमें ॥ ७७ ॥
तुझसे यह है कहा गया । यह ऐसा हुवा धनंजय ।
यह गोप्य धन निकलवाया । मुझसे आज ॥ ७८ ॥
मुझ चैतन्य शंभुका माथा । जो गीता तत्व था वह पार्थ ।
उसका गौतम बन आस्था- । निधि तू आया ॥ ७९ ॥
अपनी निर्मलतासे अर्जुन । करते सम्मुख अवलोकन ।
बन कर तू आया दर्पण । हमारे लिये ॥ ५८० ॥
अथवा भरा हुवा चंद्र तारागण । नभ सिंधुमें होता अवतरण ।
वैसे ही मैं गीता सह अंतःकरण- । में डूबा तेरे ॥ ८१ ॥
यह गीता आत्म-ज्ञानकी लता है—
त्रिविध मल निश्चित । छोड़ गया तुझे पार्थ ।
तभी तू गीता सहित । बना मम स्थान ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६२२