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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 610

यह खंभा है या मनुष्य । नहीं होता एक निश्चय ।
होता एक भास अवश्य । वैसे ही पार्थ ॥ ७६ ॥
ऐसी वस्तु होती है वैसे । वैसी नहीं दीखती जैसे ।
किंतु विपरीत भी वैसे । नहीं दीखती ॥ ७७ ॥
न होती रात या तेज । वह संधि जैसे सांझ ।
वैसे विरुद्ध ना निज । है यह अज्ञान-रूप ॥ ७८ ॥
अज्ञानावृत प्रकाश ही क्षेत्रज्ञ है--
ऐसी वस्तु होती है एक दशा । उसको कहते अज्ञान ऐसा ।
उससे लपेट लिया प्रकाश । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७९ ॥
अज्ञानको महत्व देना । अपनेको ही न जानना ।
उसी रूपको है जानना । क्षेत्रज्ञका ही ॥ ८० ॥
यह है दोनोंका संयोग । जान तू इसको चांग ।
यह है सत्ता निसर्ग- । स्वभाव जान ॥ ८१ ॥
आप ही अज्ञानत्वसे । वस्तु दीखती है वैसे ।
किंतु अनेक रूपसे । जानते नहीं ॥ ८२ ॥
जैसा कोई भ्रमता एक । हुवा अब मैं राजा देख ।
या कहे पाया-स्वर्ग-लोक । कोई भ्रमिष्ठ ॥ ८३ ॥
जब दृष्टि है दृढ जाती । तब जो जो कुछ देखती ।
तभी हुई है कहलाती । सृष्टि-प्रसूती मुझसे ॥ ८४ ॥
मनुष्य जैसे स्वप्न मोहमें । अपनेको देख नग्न-रूपमें ।
वैसे आत्म-स्फुरण अभावमें । दीखता सर्व ॥ ८५ ॥
यही मैं दूसरा प्रकार । कहता सुन धनुर्धर ।
स्वप्न-सा मिथ्या मानकर । दृढ अनुभवसे ॥ ८६ ॥
मेरी यह गृहिणी । अनादि है तरुणी ।
अनिर्वचन गुणी । है अविद्या ॥ ८७ ॥
ज्ञानेश्वरी ५३८