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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 595

वैसे एकके भूताकार । दृष्टिगत होंगे साकार ।
ब्रह्म-संपत्ति भांडार । लगेगा हाथ ॥ ८६ ॥
सर्वत्र सब तुझे अर्जुन । होगा पर-ब्रह्मका दर्शन ।
तथा अभयादि समाधान । मिलेगा तब ॥ ८७ ॥
इस भांति यह जो पार्थ । प्रकृति-पुरुष व्यवस्था ।
करलें प्रतीति सतत । चाहे वैसे वे ॥ ८८ ॥
अब तू कर वह प्रतीति । चित्तमें स्थिरकर निश्चिति ।
अब नहीं तो सुभद्रापति । तो नंतर कुछ ॥ ८९ ॥
मिला है कुल्ला करने अमृत । अथवा भांडार हुवा लक्षित ।
ऐसा मिला यह लाभ निश्चित । ज्ञान-रहस्य ॥ १०९० ॥
कहूंगा अब दो बोल । अति-गूढ अनमोल ।
चित्त देकर सकल । सुन तू वे ॥ ९१ ॥
श्रीकृष्णका यह बोल । सुनता पार्थ निश्चल ।
इंद्रियां तब केवल । करके कान ॥ ९२ ॥
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥
आत्मा और शरीरकी तुलना तथा संबंध—
अजी ! परमात्मा जो कहलाता । जलमें बिंबित हो न भीगता ।
जैसा सूर्य वैसा वह रहता । प्रकृतिमें निर्लेप ॥ ९३ ॥
जलके आदि और अंत । रहता है सूर्य सतत ।
केवल है वह बिंबित । अन्योंकी दृष्टिसे ॥ ९४ ॥
आत्मा वैसे देहमें होता कहां । रहता है वह जहांका तहां ।
कहा जाता है देहमें रहता वहां । नहीं है सत्य ॥ ९५ ॥
अव्ययी परमात्मा है तथा अनादि निर्गुण ।
देहमें रहके पार्थ करता लीपता नहीं ॥ ३१ ॥
५२३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग