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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 596

दर्पणमें मुख जैसे । बिंबित है यह वैसे ।
रहता देहमें वैसे । आत्म-तत्त्व ॥ ९६ ॥
संबंध जो देह-आत्मका । सर्वथा निर्जीव बातका ।
होता क्या बात औ' रेतिका । संबंध पार्थ ॥ ९७ ॥
आग तथा पंखमें जैसे । नत्थी करना कहो कैसे ।
या पत्थरको आकाशसे । कैसे जोडना ॥ ९८ ॥
एक जाता पूर्वकी ओर । दूसरा पश्चिमकी ओर ।
भेंट होती कैसी आखर । दोनोंकी पार्थ ॥ ९९ ॥
प्रकाश और अंधार । निर्जीव सजीव नर ।
तथा आत्मा औ' शरीर । एक समान ॥ ११०० ॥
रात्र और दिवस । कनक औ' कपास ।
नाता कैसा है वैसा । इन दोनोंका ॥ १ ॥
देह यह है पांचोंका जाल । गुण-कर्मकी गांठ केवल ।
जन्म-मृत्यु चक्र पर डाल । घुमाई जाती है ॥ २ ॥
कुंडमें जैसे कालानलके । गोले पडे हैं नवनीतके ।
हिलनेमें ही पांव माखिके । जाते पिघल ॥ ३ ॥
पडनेसे यह आगमें । भस्म हो उडता क्षणमें ।
जानेसे श्वान उदरमें । होता है मल ॥ ४ ॥
इन दोनोंसे यदि चूकता । कृमियोंका पुंज बनता ।
इसका परिणाम है पार्थ । कल्मष ही है ॥ ५ ॥
इस देहकी यह दशा । तथा आत्मा है वह ऐसा ।
नित्य-शुद्ध-सिद्ध एकसा । अनादित्वसे ॥ ६ ॥
सकल नहीं है या यह निष्कल । न अक्रिय या यह क्रिया-शील ।
नहीं यह कृश अथवा स्थूल । निर्गुणत्वसे ॥ ७ ॥
आभास नहीं या निराभास । प्रकाश नहीं या अप्रकाश ।
न अल्प अथवा बहुवस । अरूपतासे ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५२४