ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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पृष्ठ 574, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 574तथा उसको जानने पर । रहता नहीं कर्तव्य फिर ।
तथा उसको जानने पर । रहता नहीं कर्तव्य फिर ।
उससे मिलती निरंतर । तद्रूपता ॥ ६५ ॥
उस ज्ञान प्राप्तिके नंतर । संसार रहता तट पर ।
डूबा ही रहता निरंतर । नित्यानंदमें ॥ ६६ ॥
ज्ञान होता है ऐसे । आदी न होती जिसे ।
पर-ब्रह्म है ऐसे । कहते उसको ॥ ६७ ॥
इसको यदि नहीं कहते । विश्वाकारसे इसे देखते ।
यदि इसे विश्व ही कहते । विश्व है माया ॥ ६८ ॥
रूप वर्ण तथा व्यक्ति । नहीं दृश्य द्रष्टा स्थिति ।
वह है ऐसी जो मति । होगी किसकी ॥ ६९ ॥
और यदि यह नहीं है । महदादि तत्व कैसे हैं ।
कहांसे स्फुरण होते हैं । यह प्रश्न उठता ॥ ८७० ॥
तभी हैं अस्ति नास्ति ये जोड । देख यह मूक होते फोल ।
विचारकी चहल पहल । रुक जाती है ॥ ७१ ॥
जैसे घटका मटकाकार । बन रहती पृथ्वी साकार ।
वैसे सबमें सब होकर । रहता ज्ञेय ॥ ७२ ॥
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥
सभी स्थल-कालमें उनसे । भिन्न नहीं होते स्थल-कालसे ।
होती स्थूल सूक्ष्म क्रिया भूतोंसे । हाथोंसे उनके ॥ ७३ ॥
उसको इसी कारणसे । कहते विश्वबाहू ऐसे ।
जो सर्वत्र सर्व-रूपसे । करता सदैव ॥ ७४ ॥
दीखते पद हस्तादि सर्वत्र उसके शिर ।
मुख आंख तथा कान सबको घेरके रहे ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५०२