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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 452

अर्जुनका किया हुवा विराट स्तवन --
अर्जुन सुन मैं हूं काल । निगलना है मेरा खेल ।
श्रीकृष्ण तेरे यह बोल । मैं मानता हूं ॥ ९१ ॥
किंतु तू है जो महाकाल । आज विश्व-स्थितिका वेळ ।
तब क्यों संहारका खेल । यह जानता नहीं ॥ ९२ ॥
कैसे शरीरका तारुण्य तोडना । तथा कैसे वहां वार्धक्य है लाना ।
ऐसे सोचकर करनेसे न होना । स्वाभाविक है ॥ ९३ ॥
जब चार प्रहर नहीं होता । किसी भी समय क्या है अनंता ।
माध्यान्ह समय क्यों जो सविता । अस्त होगा क्या ? ॥ ९४ ॥
तू है अखंडित काल । तुझे भी है तीन वेळ ।
वे भी हैं अति सबल । अपने समयमें ॥ ९५ ॥
होने लगती जब उत्पत्ति । तब लय स्थिति जो भूलती ।
जब लय स्थिति बन आती । न उत्पत्ति प्रलय ॥ ९६ ॥
आता है जब प्रलयका वेळ । उत्पत्ति स्थितिका है अस्त काल ।
इसे टाळ न सकता है काल । जो अनादि सिद्ध ॥ ९७ ॥
आज स्थिति-कालमें है यह जग । भोगके बहारमें करता भोग ।
अब तू निगल सकता है जग । ऐसा जँचता नहीं ॥ ९८ ॥
तब संकेतसे कहता बोल । आया है इस सेनाका ही काल ।
दिखाया यह प्रत्यक्ष सकल । तुझको अभी ॥ ९९ ॥
अर्जुनकी क्षमा याचना --
पाया जब यह संकेत । देखता तब सब पार्थ ।
संपूर्ण रूपसे जगत । स्वाभाविक है ॥ ५०० ॥
तब कहता है वह अर्जुन । सूत्रधार तू रूपका महान ।
आया है पूर्व स्थितिमें संपूर्ण । सभी यह विश्व ॥ १ ॥
अजी ! दुःख सागरमें जो पडता । उनको जिस भांति तू उभारता ।
स्मरण्गा मैं सदा यह कीर्ति-कथा । श्रीकृष्ण तेरी ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८२