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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 451

सत्य-लोकका तब गंगा जल । खुलता जैसे कर कल-कल ।
वैसी खुली है वाग्धारा विशाल । बोलनेमें ॥ ८३ ॥
या जैसे महामेघका गर्जन । होते हैं एक कालमें गूंजन ।
या करें क्षीर-सागर मंथन । करता मंदराचल ॥ ८४ ॥
ऐसा गंभीर महा-नाद । कर ये वाक्य विश्व कंद ।
बोला है जो वह अगाध । अनंत रूप ॥ ८५ ॥
सुनी ये बात अर्जुनने किंचित । सुखाया भयावेग बहुत ।
न जाने सुख या भयसे हे पार्थ । कांपने लगा ॥ ८६ ॥
बोलनेमें भर आय कंठ । सहज जुडे कर संपुट ।
पुनः पुनः रखता ललाट । चरणों पर जो ॥ ८७ ॥
तथा कुछ भी नहीं बोला जाता । बोलनेमें वह गद्गद् होता ।
सुख या भयसे नहीं जानता । आप ही करें निर्णय ॥ ८८ ॥
किंतु सुना मैने देवकी बात । ऐसा कैसा हुवा है यह पार्थ ।
मैंने शब्द पर किया है अर्थ । श्लोकके यहां ॥ ८९ ॥
वैसे ही भय भीत जो अर्जुन । करता हरि पादमें वंदन ।
तथा करता है वह कथन । इस भांतिसे ॥ ९० ॥
अर्जुन उवाच
'स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यंति च सिद्धसंघाः ॥ ३६ ॥
अर्जुनने कहा
है योग्य जो कीर्तनसे तुम्हारे
संसार आनंद औ' प्रेम पाता ।
डरे हुए राक्षस भागते हैं
औ' पूजता सिद्ध समूह सारा ॥ ३६ ॥
३८१ विश्व-रूप-दर्शनयोग