ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस पर क्या रहा है अर्जुन । दीखती यह युद्धकी सेना ।
भास मात्र है बल-तेज-हीन । किया मैंने पहले ही ॥ ७५ ॥
यहां तूने देख लिया सब । मेरे मुख सुन लिया अब ।
तभी जीवन मिटा है अब । रहा भूसा ॥ ७६ ॥
अब तू ऊठ धनुर्धर । मेरे मारे हुओंको मार ।
व्यर्थका ही शोक न कर । अब तू यहां ॥ ७७ ॥
जैसे कहीं एक निशान करना । स-कौतुक उसपे तीर चलाना ।
इसी भांति यहां देख तू अर्जुन । निमित्त मात्र है ॥ ७८ ॥
अजी ! तेरे विरुद्ध जो भया । उसे कभीका शेर खा गया ।
अभी विजय काल है आया । यशको लूट ले ॥ ७९ ॥
साभिमान फूले थे जो दायाद । तथा हुए थे विश्व-दुर्मद ।
किया उनका अनायास वध । धनंजयने ॥ ४८० ॥
ऐसी यह विजय गाथा । गायेगी वांग्मय-सरिता ।
लिखो अब इसको पार्थ । विश्व-पट पर ॥ ८१ ॥
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५ ॥
ऐसी जो यह अपूर्व कथा । जिसका अपूर्ण मनोरथ ।
कहता संजय कुरुनाथ । कहे ज्ञानदेव ॥ ८२ ॥
संजयने कहा
श्रीकृष्णसे यों सुनके किरीटी
जो हाथ जोडे भयभीत होके ।
कर वंदना यों पुनश्च बोले
नमा हुवा गद्गद भावपूर्ण ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८०