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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 449

टूटा सूत्र जो था नचानेवाला । गुड्डा खंभे पर नाचनेवाला ।
खींचते ही गिरेगा अलबेला । वैसे ही यहां ॥ ६७ ॥
नष्ट करने सैन्यका आकार । न लगेगा समय धनुर्धर ।
इसीलिये उठकर सत्वर । हो बुद्धिमान ॥ ६८ ॥
तूने जब गोग्रहणके समय । मोहनास्त्र छोड़ा तब धनंजय ।
भीरु उत्तरने भी होके निर्भय । विवस्त्र किया सबको ॥ ६९ ॥
हुए हैं आज ये उससे भी तेजोहीन । अनायास युद्ध चल आया स-सम्मान ।
पा लो यश जीत कर शत्रुको अर्जुन । अकेला लडके ॥ ४७० ॥
तना नहीं है यहां कोरा यश । होगा सकल राज्य वैभव तेरे वश ।
मुझसे मारे ये पहले ही अब शेष । निमित्त हो सव्यसाची ॥ ७१ ॥
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा ।
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥
दोनों सेनाओंमें केवल पांडव ही बचेंगे—
द्रोणकी परवाह न कर । भीष्मका भय भी तू न धर ।
न सोच तू कैसे कर्ण पर । पाऊं विजय ॥ ७२ ॥
कौन उपाय जयद्रथ पर । करना उसकी चिंता न कर ।
तथा यहां हैं जो जो महावीर । प्रसिद्ध महारथी ॥ ७३ ॥
ये एक एक तू अर्जुन । चित्रके ही सिंह मान ।
गीले हाथ लीप लोपन । करना इनका ॥ ७४ ॥
ये द्रोण ये भीष्म जयद्रथादि
या कर्ण या अन्य महान योद्धा ।
मैंने हने जो उनको तु मार
निःशंक जूझो जय मान तेरी ॥ ३४ ॥
३७९ विश्व रूप-दर्शनयोग