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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 372

वैसे देशी और संस्कृतवाणी । सोहती सार्थ चिर-संगिनी ।
भावार्थ-सिंहासन भूषिणी । शुद्ध भावसे ॥ ४५ ॥
खिलाया जहां भावोंका रूप । आया है रस-वृत्तिमें ओप ।
प्रतिष्ठा मिली हमें अमाप । कहता चातुर्य ॥ ४६ ॥
वैसे देशीका लावण्य । जिससे लेके तारुण्य ।
रचा है फिर अगण्य । गीता-तत्व ॥ ४७ ॥
ऐसा चराचर गुरुवर । जो चतुर चित्त चमत्कार ।
वह सुनोजी यादवेश्वर । बोलने लगे ॥ ४८ ॥
कहे ज्ञानदेव निवृत्तिदास । सुनो श्री हरि बोले जो सरस ।
अर्जुन तू है अन्यंग सर्वस । अंतः करणका ॥ ४९ ॥
भगवान उवाच
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥
मैं तेरी आंखों से दीखता हूं उतना ही नहीं—
हमने जो निरूपण किया । तेरा अवधान भी देख लिया !
वह भी हमने संपूर्ण पाया । धनुर्धर ॥ ५० ॥
देखना घटमें भर अल्प नीर । वह नहीं चुआ तो अधिक भर ।
देखी तेरी चाह कुछ कह कर । अब कहता हूं सुन ॥ ५१ ॥
कोई आया जो अनायास । उस पर छोड़ा सर्वस ।
हुआ मेरा निज-निवास । तू इस समय ॥ ५२ ॥
पार्थकी योग्यता देख सर्वेश्वर । ऐसे बोलने लगा सादर ।
आती मेघमाला जैसे घर कर । देख हिमालय ॥ ५३ ॥
फिरसे सुन तू मेरी बात उत्तम अर्जुन ।
प्रेमसे कहता तेरी करके हित-कामना ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी : ३०२