ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी ! गूड़ शर्करा औ' राब । होते एक ही वस्तुके सब ।
अनुभवती है स्वाद जीभ । भिन्न भिन्न ॥ ३३ ॥
कुछ जान करके कहते । कुछ पुनः पुनः ज्ञान देते ।
कुछ जानतेमें है खो जाते । ज्ञेय गुणमें ॥ ३४ ॥
ये सारे अध्याय मैंने गुरु-कृपासे गाये है—
ऐसे हैं ये गीताके अध्याय । नवम है अनिर्वचनीय ।
गाया मैंने कर श्रवणीय । तव सामर्थ्यसे ॥ ३५ ॥
किसीके दंडसे सूर्योदय कराया । किसीसे नव-विश्व ही है रचाया ।
सिंधुमें पाषाण तैराके उतराया । सैन्य तुमने ॥ ३६ ॥
किसीसे आकाशमें सूर्य पकड़वाया । किसीसे सागरका आचमन करवाया ।
तुमने ही मुझ गंवारसे है गवाया । अनिर्वचनीय ऐसे ॥ ३७ ॥
पर यह रहने दो तू ऐसे । राम-रावण भिडे थे कैसे ।
राम-रावण भिडे थे वैसे । समरमें जो ॥ ३८ ॥
वैसे नवमें श्री कृष्णका बोलना । उसे नवम जैसा ही है कहना ।
गीता-तत्त्वज्ञ जाने यह कहना । मेरा समुचित ॥ ३९ ॥
नवमका प्रारंभिक कथन । जिसका किया अल्पसा वर्णन ।
अब उत्तर खंडका श्रवण । कीजियेगा ॥ ४० ॥
यहां विभूति प्रति विभूति । धनुर्धरसे हैं कही जाती ।
उसमें चातुर्य-रस-वृत्ति । प्रतीत होगी ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरका मातृभाषा प्रेम-मेरा अनुवाद गीताके तोडका है—
यहां देशिका नागरिकपन । जीतेगा शांत श्रंगारको जान ।
ओवियां ये होंगी महा-भूषण । साहित्यका ॥ ४२ ॥
मूल-ग्रंथ जो गीता संस्कृतका । तथा यह अनुवाद देशिका ।
जाननेसे मूल अनुवादका । होगा अनुभवैक्य ॥ ४३ ॥
जैसे शरीरका सुंदरपन । बनता अलंकारका भूषण ।
सजा कौन किससे यह ज्ञान । होता नहीं ॥ ४४ ॥
३०१ विभूति-चिंतनयोग