ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबोले कृपालुओंके राज । सुन धनुर्धर तू आज ।
कहा था तुझको जो गूज । कहूंगा पुनरपि ॥ ५४ ॥
अजी ! प्रतिवर्ष जैसे खेत पेरना । हरे भरे खेतको फिर काट-लेना ।
खेतमें श्रमने कभी न डकताना । पाने अधिक उपज ॥ ५५ ॥
पुनः पुनः पुट देनेसे । सुवर्ण चमकता जैसे ।
वैसा सुवर्ण खोजनेसे । मिलता नहीं ॥ ५६ ॥
यहां भी ऐसा ही है पार्थ । तेरे हित नहीं सर्वथा ।
सुनो अपने ही स्वार्थार्थ । बोलता मैं ॥ ५७ ॥
करनेसे शिशुका अलंकार । होगा क्या उसपर उपकार ।
देखके होंगे आनंद विभोर । स्वयं माता पिता ॥ ५८ ॥
जैसे तू अपना हित पूर्ण । जानेगा हम होंगे प्रसन्न ।
यह है वास्तविकता जान । हमारे कहनेकी ॥ ५९ ॥
जाने दो सुमन सुभाषित । तुझसे है ममत्व बहुत ।
औ' तुझे भाती है यह बात । तभी कहता हूं ॥ ६० ॥
अर्जुन हम इसी कारण । करते हैं तुझसे भाषण ।
सुन यह स-अंतःकरण । चित्त देकर ॥ ६१ ॥
सुन सुन तू यह मर्म । मेरा वाक्य यह परम ।
आया स्वयं अक्षर-ब्रह्म । तुझसे मिलने ॥ ६२ ॥
पार्थ तू मुझको न जानता । न जानो तो मैं यह कहता ।
अजी ! मैं जो यहां हूं बोलता । मानो ब्रह्मांड ही है ॥ ६३ ॥
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥
यहां वेद हुए मौन । लंगडा हुआ पवन ।
बिन रातके विलीन । होते रवि-शशि ॥ ६४ ॥
न देव जानते मेरा प्रभाव न महर्षि भी ।
सभी प्रकारसे मैं हूं उनका मूल कारण ॥ २ ॥
३०३ विभूति-चिंतनयोग