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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 370

शब्दारण्यमें भटक दिन-रात । न सुनी अक्षर फलनेकी बात ।
वाचा-बनी स्वयं कल्पलता सत्- । विवेककी यहां ॥ २० ॥
देहात्म-बुद्धि भी जो निरंतर । बनी थी मंदिर आनंदका भंडार ।
मनने किया गीतार्थका सागर । शयन सुखसे ॥ २१ ॥
श्री गुरुकी लीला अपार । करूं कैसे वर्णन मै पामर ।
फिर भी गाया ढीठ बनकर । सहन कीजिये यह ॥ २२ ॥
आपका ही कृपा-प्रसाद । बना भगवद्गीता प्रबंध ।
पूर्वार्ध गाया स-विनोद । ओवियोंमें ॥ २३ ॥
सूत्र रूपसे पिछले नौ अध्यायोंका उपसंहार --
पहलेमें अर्जुनका विषाद । दूसरेमें गाया योग विशुद्ध ।
किंतु सांख्य तथा ज्ञानका भेद । दिखा कर ॥ २४ ॥
तीसरेमें केवल कर्म प्रतिष्ठित । चौथेमें वही ज्ञान-सह प्रकटित ।
पांचवेमें अष्टांग-योगका गुपित । कहा वैसे ही ॥ २५ ॥
छठेमें कहा वही प्रकट । आसनादि-सह कर स्पष्ट ।
जीवात्म-भावैक्य जो है श्रेष्ठ । होता जिससे ॥ २६ ॥
वैसी ही वह योग-स्थिति । योग-भ्रष्टोंकी है क्या गति ।
वह पूर्णस-उपपत्ति । सुना दी है ॥ २७ ॥
उस पर है जो सप्तम । प्रकृति-रूप उपक्रम ।
भक्त चार पुरुषोत्तम । होते हैं कैसे ॥ २८ ॥
फिर सप्तमीकी प्रश्न सिद्धि । कह करके प्रयाण-सिद्धि ।
एवं सकल वाक्य अवधि । अष्टमाध्यायमें ॥ २९ ॥
अगणित है जो शब्द-ब्रह्म । उसमें है जो अर्थ परम ।
महा-भारतमें अनुपम । एक लक्ष्यमें मिलता ॥ ३० ॥
फिर अठारह पर्व भारतमें । मिलता वह कृष्णार्जुन उक्तिमें ।
तथा अभिप्राय जो सप्तशतिमें । नौवेमें मिलता ॥ ३१ ॥
तभी नवमका अभिप्राय । पूर्ण हुआ करनेमें भय ।
प्रतीत कर नवमाध्याय । हुआ किस गर्वसे ॥ ३२ ॥
ज्ञानेश्वरी ३००