ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेरा ही स्नेह वागीश्वर। कर गूंगेका अंगीकार।
स्पर्धा बाहस्पतिसे कर। जीतता वह ॥ ८ ॥
पडती दृष्टि तेरी जिस पर। रखता तू सिरपे पद्मकर।
करता वह जीव होने पर। समानता शिवसे ॥ ९ ॥
श्री गुरुका अवर्णनीय - महिमा -
जिसकी महिमांका यह करना। वाचालतासे वर्णन क्या करना।
सूर्यको कैसे उबटन लगाना। चमकाने को ॥ १० ॥
कल्पतरुके फलका कैसे बहार । क्षीरसागरका कैसा पाहुनाचार ।
अन्य किस गंधकी अपेक्षा कर्पूर । सुवासित करनेमें ॥ ११ ॥
चंदनको किसका उबटन । अमृतका कैसे करें पक्वान ।
कैसे बांधे गगनपे भवन । कहो मुझसे ॥ १२ ॥
वैसे श्री गुरुका महिमान । आकलनका क्या है साधन ।
यह जानके किया नमन । मैंने चुपचाप ॥ १३ ॥
बुद्धिकी संपन्नता पर समर्थ । श्री गुरु-वर्णन करना यथार्थ ।
मोति पर पानी चढाना है सार्थ । अभ्रकका वैसे ॥ १४ ॥
स्वर्ण पर रौप्यका पानी चढाना । वैसा है श्रीगुरुका स्तवन गाना ।
स-मौन श्री-चरणपे नत होना । यही भला है ॥ १५ ॥
गीताकी यह धरोहर श्री गुरु-कृपाका फल है—
अजी ! श्रीगुरु परम उदार । कृपा-दृष्टी रखते हम पर ।
तभी कृष्णार्जुन संगम पर । प्रयाग बने हम ॥ १६ ॥
मांगा जब दूध घूंट भर । बना क्षीरसागर कटोर ।
सम्मुख रखता है शंकर । उपमन्युके वैसे ॥ १७ ॥
अथवा जैसे वैकुंठनायक । रिझाया ध्रुव जब स-कौतुक ।
रीझाया ध्रुवपद भातुक । समझाके वैसे ॥ १८ ॥
ब्रह्मविद्याका जो राजा महान । सकल शास्त्रका बसति स्थान ।
ओवियोंमें भगवद्गीता गान । संभव किय ॥ १९ ॥
२९९ विभूति-चिंतनयोग