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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 247

ऐसी निज-कांतिको खोकर । केवळ प्राण-रूप होकर ।
ऐसी देखती है धनुर्धर । कहूंगा अब ॥ ८३ ॥
कोई पुतली ही हो पवनकी । अपनी ओढेनी स्वर्णांबरकी ।
उतार कर रखी हो निजकी । अलग करके ॥ ८४ ॥
अथवा लहरसे वायुकी । मिटी हो अभी ज्योत दीपकी ।
चमक लहर बिजलीकी । अस्त हुई गगनमें ॥ ८५ ॥
अथवा हृदय-कमल पर्यंत । गया मानो प्रकाश-जलका झोत ।
अथवा स्वर्णधार आदिसे अंत । बहती हुई ॥ ८६ ॥
फिर वह हृदयाकाशमें । समायी हो एक रूपमे ।
जैसे शक्ति शक्तिके रूपमें । समायी जाती ॥ ८७ ॥
तभी वह शक्ति ही कहलाता । केवळ प्राण वायु जो रहता ।
नाद बिंदु अब नहीं जानता । कला औ" ज्योति ॥ ८८ ॥
करना मनका निरोध । तथा प्राणका अवरोध ।
ध्यानकी न रहती साध । तब अर्जुन ॥ ८९ ॥
कल्पनाका त्याग-भोग । न रहता अनुराग ।
महा-भूतोंका सुराग । रहता नहीं ॥ २९० ॥
पिंडसे करना पिंडका ग्रास । यह है नाथ-संकेत सारांश ।
कह गया यह महोपदेश । महाविष्णु ॥ ९१ ॥
रहस्यका बांध ढा कर । यथार्थका तह खोलकर ।
रखी सन्मुख मैंने सादर । ग्राहक श्रोतोंके ॥ ९२ ॥
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियत मानसः ।
शांतिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥
शक्तिका जब तेज लोपता । देहका तब रूप मिटता ।
फिर आंखोंमें ही छिप जाता । विश्वकी वह ॥ ९३ ॥
ऐसे मगन आत्मामें होता योगी मनो-जयी ।
मोक्षसे जो भिडी शांति पाता हो मुझमें रत ॥ १५ ॥
१७७ आत्म-संयमयोग
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