ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे ऋतुपतिका द्वार । वनश्रीसे ही निरंतर ।
लदा रहता फल भार । सौंदर्यमय ॥ १०० ॥
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥
वैसे सब सुखके साथ । दैव ही जैसे मूर्तिमंत ।
खोज कर तुम्हारा पथ । आयेगा जान ॥ १ ॥
होंगे समस्त भोग भरित । वैसे ही सदा इच्छा रहित ।
होंगे यदि स्वधर्म निरत । रहोगे भाई ॥ २ ॥
किंतु सकल संपदा तजकर । तथा इंद्रिय मदमें डूब कर ।
विषय स्वादमें जो लुब्ध होकर । रहता है सदा ॥ ३ ॥
तजकर वह यज्ञ भाव । देते हैं जो यज्ञ-तुष्ट देव ।
रख ईश्वरमें भक्ति भाव । भजेगा नहीं ॥ ४ ॥
न अग्नि मुखमें हवन । न करेगा देवतार्चन ।
न प्राप्त समय भोजन । ब्राह्मणोंको ॥ ५ ॥
नहीं करेगा गुरु-भक्ति । तथा न आदर अतिथि ।
न रखेगा संतुष्ट जाति । अपनी भी ॥ ६ ॥
स्वधर्म-क्रिया रहित । संपन्नतामें प्रमत्त ।
ऐसा मात्र भोगासक्त । होगा वह ॥ ७ ॥
इसमें है आपदा बहुत । संपदा होगी उसकी हत ।
न भोग सकेगा वह प्राप्त । भोग भी कभी ॥ ८ ॥
शरीर है जिसका गतायुष । उसमें न होता चैतन्यवास ।
दैव हत घरमें कभी वास । न होता लक्ष्मीका ॥ ९ ॥
लोप होता है जब स्वधर्मका । टूटता तब आश्रय सुखका ।
मिटता बुझनेसे दीपकका । प्रकाश जैसे ॥ १० ॥
यज्ञ-तुष्ट तुम्हें देव देंगे इच्छित भोग जो ।
उनका न उन्हे देके खाता जो वह चोर है ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८६