ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमिटती है जब निज-वृत्ति । न रहती स्वातंत्र्यकी बस्ती ।
सुनो प्रजाजन यह उक्ति । कहता है ब्रह्म ॥ ११ ॥
जो कोई स्वधर्म छोड़ेगा । उसको काल दंड देगा ।
चोर मानके हर लेगा । उसका सर्वस ॥ १२॥
जन्म देता सभी पापको । घेर लेते हैं जो उसको ।
रात्रि स-समय श्मशानको । जैसे भूत ॥ १३ ॥
दुःख ल्केश वहां त्रिभुवनके । पाप अनेकानेक प्रकारके ।
घर करते हैं दैन्य विश्वके । उसी स्थानमें ॥ १४ ॥
वह उन्मत्त ऐसे । कितने ही रोनेसे ।
कल्पांतमें भी उसे । नहीं मुक्ति ॥ १५ ॥
इसलिये निज धर्म न छोड़ना । इंद्रियोंको नहीं भड़कने देना ।
चतुरानने कहे ये वचन । प्रजा जनसे ॥ १६ ॥
छोड़ते ही जैसे जलचर । उसी क्षणम जाता है मर ।
वैसा ही स्वधर्म छोड़कर । होता नाश ॥ १७ ॥
इसलिये तुमको समस्त । अपनेलिये है जो उचित ।
स्वकर्ममें रहना उचित । कहा ब्रह्माने ॥ १८ ॥
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यंते सर्वकिल्बिषैः ।
भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥१३॥
तन त्यक्तेन-शेष प्रसाद सेवन —
जो विहितक्रिया विधि । करे निर्हेतुक बुद्धि ।
जिससे प्राप्त समृद्धि । करता विनियोग ॥ १९ ॥
गुरु गोत्र अग्नि जो पूजता । स-समय द्विजको भजता ।
निमित्तादिकमें जो यजता । पितरुद्देशसे ॥ १२० ॥
यज्ञ क्रियामें जो उचित । आहुति देकर बचत ।
हुत शेष ही स्वभावतः । रहता है ॥ २१ ॥
खाके संत यज्ञ-शेष जलाते दोष हैं सब ।
पापी वे पाप खाते हैं पकाते अपने लिये ॥ १३ ॥
८७ कर्मयोग्