ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन करना अनुष्ठान । न यात्रादि तीर्थस्थान
औ' अन्य देह दंडन । करना नहीं ॥ ८९ ॥
न करे योगादि साधन । तथा सकाम आराधन ।
मंत्र तंत्र आदि विधान । अनावश्यक ॥ ९० ॥
देवताओंका पूजन । सर्वथा ही वर्ज मान ।
करो स्वधर्माचरण । अनायास ॥ ९१ ॥
सदा अहेतुक भावसे । पतिव्रता जैसे पतिसे ।
अनुसरना तुम वैसे । स्वधर्मको ॥ ९२ ॥
वैसा स्वधर्म रूप मख । यही नित्य सेव्य है एक ।
ऐसा सत्य-लोक नायक । कहने लगे ॥ ९३ ॥
नित जो स्वधर्म भजेगा । उसकी कामधेनु होगा ।
न प्रजाको वह त्यजेगा । यह निश्चित ॥ ९४ ॥
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
इससे होगा समस्त । संतुष्ट होंगे दैवत ।
फिर तुम्हे वे ईप्सित । देंगे वर ॥ ९५ ॥
स्वधर्म पूजनसे नित । देव गण मिल समस्त ।
योग क्षेम सब निश्चित । देखेंगे तुम्हारा ॥ ९६ ॥
देवोंको तुम भजोगे । देव तुम्हें तोष देंगे ।
ऐसा परस्पर होगा । प्रेम वहां ॥ ९७ ॥
जहां जो करना चाहेगा । वह सहज सिद्ध होगा ।
वांछित जो वर मिलेगा । मानसका ॥ ९८ ॥
वाचा सिद्धि मिलेगी । आज्ञा धारक होंगी ।
तुमसे आज्ञा लेंगी । महा सिद्धियां ॥ ९९ ॥
देवोंको यज्ञसे तोषो तोषेंगे देव भी तुम्हें ।
अन्योन्य करके तुष्ट पावो परम श्रेयको ॥ ११ ॥
८५ 'कर्मयोग'