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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 152

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥
स्वधर्म अनादि और अनिवार्य –
स्वधर्म जो है अर्जुन । वही नित्य यज्ञ ज्ञान ।
करनेसे आचरण । नहीं पाप ॥ ८१ ॥
त्यजनेसे निज-धर्म । चिपकते हैं कुकर्म ।
यह बंधनका मर्म । सांसारिक ॥ ८२ ॥
तभी स्वधर्माचरण । नित्य यज्ञके समान ।
जिससे होता बंधन । कभी नहीं ॥ ८३ ॥
लोक है यह कर्ममें बद्ध । परतंत्र देहमें आबद्ध ।
क्यों कि हैं नित्य यज्ञ विरुद्ध । चलनेसे ॥ ८४ ॥
इस विषयमें अब पार्थ । कहता हूं तुझे एक कथा ।
विश्व आदिकी यह है संस्था । रची ब्रह्माने ॥ ८५ ॥
सहयज्ञाः प्रजाःसृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वम् एषवोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
वह नित्य-याग सहित । सृजे भूत मात्र समस्त ।
किंतु ये यज्ञसे अज्ञात । सूक्ष्म होनेसे ॥ ८६ ॥
प्रार्थना जब की प्रजाने ब्रह्माकी । औ' याचना की उनसे आश्रयकी ।
कमल संभवने तब बात की । भूतमात्रसे ॥ ८७ ॥
वर्ण विशेषको हमने उचित । व्यवस्था की है स्वधर्मकी निश्चित ।
उस पर चलनेसे है खचित । इच्छा तृप्ति ॥ ८८ ॥
यज्ञार्थ कर्मको छोड लोकमें कर्म-बंधन ।
यज्ञार्थ ही कर कर्म अर्जुन मुक्त संग तू ॥ ९॥
प्रजाके साथ ही यज्ञ ब्रह्माने सृजके कहा ।
यज्ञोंसे ही बने श्रेष्ठ तुम्हारी कामधेनु ये ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ८४