ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा बोलना जान व्यर्थका । हल करना उलझनका ।
त्यजनेसे न होता कर्मका । त्याग निश्चित ॥ ५२ ॥
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥
कर्मातीत अवस्थामें कर्मत्याग असंभव—
जब है प्रकृतिका अधिष्ठान । तब छोड़ना करना अज्ञान ।
चेष्टायें चलती हैं गुणाधीन । अपने आप ॥ ५३ ॥
विहित कर्म है जितना । ठान लिया यदि त्यागना ।
मिटेंगे क्या स्वभाव नाना । इंद्रियोंके ॥ ५४ ॥
सुनना छोड़ेंगे क्या कान । देखना छोड़ेंगे नयन ।
सूंघना भूलेगा क्या घ्राण । गंध जो ॥ ५५ ॥
अथवा प्राणापानकी गति । निर्विकल्प बनेगी क्या मति ।
तथा क्षुधा-तृषादिकी आर्ति । मिटेगी क्या ॥ ५६ ॥
मिटेगा क्या स्वप्नादि बोध । भूलेंगे क्या चलना पाद ।
तथा जन्म-मृत्युका नाद । मिटेगा क्या ॥ ५७ ॥
यह सब नहीं रुकता । इसीलिये कर्म रहता ।
कर्मका त्याग नहीं होता । देह धारिका ॥ ५८ ॥
कर्म होता है पराधीन । प्रकृति गुणसे निष्पन्न ।
चित्तका यह अभिमान । है व्यर्थका ॥ ५९ ॥
बैठा जब रथ पर । अति निश्चल होकर ।
किंतु चले पथ पर । परतंत्र हो ॥ ६० ॥
अथवा उड़ा हवासे । सूखा पत्ता ऊंचा जैसे ।
भ्रमता निश्चेष्टतासे । आकाशमें ॥ ६१ ॥
बिना कर्म कभी कोई न रहे क्षण-मात्र भी ।
प्रकृति गुणसे सारे बद्ध हो करते नित ॥ ५ ॥
८१ कर्मयोग