सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 150

वैसे प्रकृति आधार । कर्मेंद्रियोंके विकार ।
चले कर्म निरंतर । नैष्कर्म्यका ॥ ६२ ॥
जब तक नाता है प्रकृतिका । तब तक त्याग न होता कर्मका ।
ऐसा करूंगा कहनेवालों का । रहता है उठ ॥ ६३ ॥
कर्मेंद्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥
कर्म त्यागमें नैष्कर्म्यका दंभ—
उचित कर्म जो छोड़ते । नैष्कर्म्य साधना चाहते ।
प्रकृति निरोध करते । कर्मेंद्रियोंकी ॥ ६४ ॥
उनका कर्म त्याग नहीं होता । कर्तव्य भाव मनमें रहता ।
वैसा केवल बनाव बनता । दरिद्र जो ॥ ६५ ॥
ऐसे वे रहते पार्थ । विषयासक्त सर्वथा ।
जानना यह तत्वता । विभ्रांत ॥ ६६ ॥
अब मेरी बात सुन । अवसर है अर्जुन ।
कहता नैष्कर्म्य चिन्ह । तुझसे मैं ॥ ६७ ॥
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेंन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥
आत्मरत कर्मोंसे कर्म-मुक्त नैष्कर्मी है –
होता जो अन्तरमें दृढ । परमात्म रूपमें गूढ ।
बाहर लौकिकमें रूढ । सबका सा ॥ ६८ ॥
इंद्रियोंको आज्ञा नहीं देता । विषयोंका भय न धरता ।
प्राप्त कर्म वह न छोड़ता । उचित जो ॥ ६९ ॥
रोक कर्मेंद्रियोंको तो चित्तमें स्मरता रहा ।
विषयोंको मह-मूढ मिथ्याचारी कहा उसे ॥ ६ ॥
मनसे इंद्रियोंको तो लगके कर्ममें नित ।
निःसंग रहता योगी माना वह विशेष है ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ८२