ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंछी जैसे उड़कर । पाता है फल सत्वर ।
पायेगा क्या ऐसा नर । पक्षि की भाँति ॥ ४१ ॥
चढ़ेगा वह डाल डाल । देख करके काल बेल ।
धीरेसे पायेगा ही फल । निश्चित ॥ ४२ ॥
वैसे विहंगम गतिसे । आचरण कर ज्ञानसे ।
सांख्य अति तीव्र गतिसे । पाता मोक्ष ॥ ४३ ॥
वैसे योगी कर्माधार । विधिसे कर्म आचर ।
पूर्णत्व स-अवसर । पाता ही है ॥ ४४ ॥
न कर्मणामनारम्भात्रैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
न कर कर्मारंभ उचित । बनना चाहे तो सिद्धवत ।
कर्म हीनको जान निश्चित । असंभव ॥ ४५ ॥
प्राप्त कर्म छोड़ना । फिर नैष्कर्म्य होना ।
व्यर्थ बोल अर्जुन । मूर्खताके ॥ ४६ ॥
वहां किनारे लगना । यहां नावको त्यजना ।
ऐसी बातोंका घडना । कैसे होगा ॥ ४७ ॥
इच्छा करना भोजनकी । किंतु पाक न करनेकी ।
सिद्ध पाक भी त्यजनेकी । होगी कैसी ॥ ४८ ॥
जब तक नहीं हुई निरिच्छिता । तब तक कर्मकी अनिवार्यता ।
आत्म तृप्तिसे मिटता स्वभावता । कर्म बंधन ॥ ४९ ॥
इसलिये तू सुन पार्थ । जिसे है नैष्कर्म्यमें आस्था ।
उसे उचित कर्म सर्वथा । नहीं त्याज्य ॥ ५० ॥
अपने करनेसे होता । तथा छोड़नेसे मिटता ।
इच्छा पर है क्या चलता । कभी कर्म ॥ ५१ ॥
टालके कर्म आरंभ नैष्कर्म्य मिलता नहीं ।
संन्यासकी क्रियासे ही न पाते पूर्ण सिद्धिको ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०