ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीर्ति है तेरी निःसीम । वैसी ही जो निरुपम ।
तेरे गुण भी उत्तम । तीनों लोकमें ॥ ११ ॥
नृपति जो हैं त्रिभुवनके । गाते हैं गीत भाट बनके ।
डरते गीत सुनकरके । कृतांत भी वे ॥ १२ ॥
ऐसी तेरी महिमा महान । गंगाकी गरिमाके समान ।
देख करके सुभट मर्न । चकित होता ॥ १३ ॥
पौरुष तेरा ऐसा अद्भुत । सुनकरके ये हैं समस्त ।
जीवनसे हुये वे विरक्त । अपने ही ॥ १४ ॥
सिंह गर्जनासे जैसे । कांपते हैं हाथी वैसे ।
कौरव तेरे भयसे । होते त्रस्त ॥ १४ ॥
जैसे हैं पर्वत वज्रसे । अथवा सर्प गरुड़से ।
वैसे अर्जुन हैं तुझसे । सहमतें सब ॥ १६ ॥
जायेगी वह महानता । चिपकेगी अति दीनता ।
यदि तू यहांसे लौटता । युद्धके बिना ॥ १७ ॥
किंतु तुझे ये भागने नहीं देंगे । पकड़ अति अपमान करेंगे ।
अमर्याद कटु वचन कहेंगे । तेरे ही सम्मुख ॥ १८ ॥
तब होगा विदीर्ण हृदय । अब न लड़ना क्यों कौंतेय ।
राज्य करेगा पाकर जय । पृथ्वीतलका ॥ १९ ॥
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥
अथवा यहीं रण भूमिमें । पावोगे मृत्यु भी लड़नेमें ।
अनायास ही स्वर्ग लोकमें । पहुंचेगा तू ॥ २२० ॥
इसी लिये तू यहां पर । छोड़कर सारे विचार ।
करमें ले कमान तीर । लडो शीघ्र ॥ २१ ॥
मरनेसे स्वर्ग भोग जीतनेसे धरातल ।
तथैव पार्थ तू उठ युद्धार्थ कर निश्चय ॥ ३७ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६