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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 125

स्वधर्मका है आचरण । करता दोष निवारण ।
चित्तभ्रम किस कारण । जो है पाप ॥ २२ ॥
डूबेगा क्या कोई नांवसे । अड़े क्या कोई पथसे ।
सही न चलने आनेसे । होगा ये सब ॥ २३ ॥
अमृत-पान भी मारेगा । विष-सह यदि पीयेगा ।
स्वधर्म भी दोष लायेगा । सहेतुक जो ॥ २४ ॥
इसीलिये तुझको पार्थ । निरहेतुक हो सर्वथा ।
लडनेमें क्षात्र-धर्मार्थ । नहीं पाप ॥ २५ ॥
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥
सम-बुद्धिसे लड —
संतोष न मानना सुखमें । विषाद न मानना दुखमें ।
तथा लाभालाभ भी मनमें । नहीं धरना ॥ २६ ॥
यहां जो विषय भी होगा । या सर्वथा तन जायेगा ।
न सोचना आगे क्या होगा । पहलेसे ही ॥ २७ ॥
उचित जो अपना । स्वधर्म सो करना ।
प्राप्तव्यको भोगना । शांत भावसे ॥ २८ ॥
ऐसे होनेसे तू सम चित्त । होगा सहज ही पाप-मुक्त ।
इसलिये हो तू युद्ध रत । निश्चिंत भावसे ॥ २९ ॥
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोंगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥
बुद्धियोगका वज्र कवच —
सांख्य स्थिति यह संक्षिप्त । किया तुझको निरूपित ।
तभी होकरके निभ्रांत । लडना अब ॥ २३० ॥
हानि लाभ सुख दुःख सम हो हार जीतमें ।
फिर युद्धार्थ हो सिद्ध न होगा पाप लिप्त तू ॥ ३८ ॥
सांख्य बुद्धि यही जान सुन तू योग बुद्धि भी ।
तोडेगा उससे सारे जगमें कर्म बंधन ॥ ३९ ॥
(४) ५७ सांख्ययोग