ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदि तू स्वधर्म छोडेगा । महापापका भागी होगा ।
कल्पांतमें भी न मिटेगा । कलंक अकीर्तिका ॥ १ ॥
भलोंको तब तक ही जीना । जब तक कुयश न पाना ।
इससे कैसे अब बचना कह तू अर्जुन ॥ २ ॥
निर्मत्सर तू सहृदयतासे । जायेगा लौट रण-भूमिसे ।
किंतु सभी न मानेंगे इसे । युद्ध भूमिमें ॥ ३ ॥
घेरेंगे यहां चहूं ओर । चलेंगे तीर पर तीर ।
कैसे होगा यहांसे पार । कृपालुतासे ॥ ४ ॥
इस प्राण संकटसे मुक्त । हुआ तो अपकीर्तिमें लिप्त ।
ऐसा जीवन भी है निश्चित । मृत्युसे हीन ॥ ५ ॥
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥
न सोचता तू और एक बात । आया रणमें उत्साह सहित ।
लौटेगा यदि हो रण विरत । युद्ध भूमिसे ॥ ६ ॥
सोच देख तब अर्जुन । सोचेंगे क्या शत्रु दुर्जन ।
मानेंगे क्यां सत्य वचन । यह कहो मुझे ॥ ७ ॥
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥
कहेंगे वे गयारे गया । पार्थ हमसे डर गया ।
यह वाक्य जो गूंज गया । तब क्या होगा ॥ ८ ॥
अनेक कष्ट करके जन । करते हैं स्वयश रक्षण ।
समय पे कर प्राणार्पण । आनंदसे ॥ ९ ॥
तुझे वह अनायाससे मिला अनजान भावसे ।
वह भी अद्वितीय जैसे । आकाश है ॥ २१० ॥
डरके रणसे भागा मानेंगे ये महारथी ।
मान्य तू इनमें आज पायेगा क्षुद्रता फिर ॥ ३५ ॥
बोलेंगे शत्रु जो तेरे अवाच्य कुत्सित सब ।
कोसेंगे शौर्य जो तेरा यह है अति दुःखद ॥ ३६ ॥
५५ सांख्ययोग