ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1166, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंविस्फुलिंग – चिनगारी,
विस्मरण विस्मृती-भूलना, भूलनेकी क्रिया.
विस्मित – आश्चर्य चकित, चमत्कृत.
विहंग, विहंगम- आकाशमें उडनेवाला पक्षी.
विहितकर्म- शास्त्रोंद्वारा कहे गये कर्म.
विज्ञ- जानकार, विद्वान.
विज्ञान- प्रापंचिक ज्ञान, बुद्धिकी जानकारी
आचरणमें लानेकी कुशलता.
अपरोक्षानुभूत ज्ञान. शास्त्रोक्त
कर्मोंसे बुद्धि ईश्वरमे स्थिर करना.
वीतराग- विरक्त.
वृत्ति- मनोदशा, मनकी अवस्था, स्वभाव,
भावना, आचार पद्धति, चित्त
वृति, चरितार्थका साधन.
वेदप्रतिपाद्य,- वेदोंद्वारा प्रतिपादित विषय.
वेदवादरत-वेदके अर्थवादमें शब्दार्थ वादमें.
मग्न.
वेद्य- जानने योग्य.
वेध- चित्तका आकर्षण, धुन, रट, झक,
चसका, लत.
वेधना- व्यापना.
वेष्टन- आवरण.
वैखरी- चारवाणियोंमें एक स्वपरवेद्य वाणी.
वैजयंतीमाला- श्रीविष्णुके गलेमें पडी एक-
माला जिसमें पंचतत्वदर्शक
पांचोंरत्न होते हैं हीरा आकाश,
माणिक्य अग्नि, पुष्कराग वायु.
मोति जल, नील पृथ्वी.
वैराग्य – अनिष्ट विषयोंको वर्ज्य माननेका
भाव, अनासक्ति, किसी भी
सत्ताके विषयमें उदासीनता,
व्याप – अपनेमें समालनेकी वृति.
व्यभिचार – कृतघ्नता, भ्रष्ट होनेकी वृत्ति,
अलगता, अंतर, बीचमें परदा
होना.
व्यसन- कुटेव, विषयानुरक्ति, आसक्ति
लंपटता,
व्याख्यान- किसी विषयक, प्रमेयका विवेचन
करके उसको समझाना.
व्याघ्र गह्वर- शेरकी मांद.
व्यापना- अपनेमें समालेना.
व्यापक- सर्वगत, जो सर्वत्र रहा हो.
व्याल विवर- सांपका बिल.
व्रत- नैष्ठिक नियम.
श
शतघ्नी- तोप; जिससे सौ सौ लोग मारे
जाते हों.
शतधा- सैंकडो प्रकारसे.
शतमख- सौ यज्ञ.
शतमखउत्तीर्ण- सौ यज्ञ करके इंद्रपद पाया
हुवा.
शब्दब्रह्म- वेद.
शम- अंतःकरणके संयमके कारण स्वस्थता,
शांत होना, अंतर्दाहका शमन.
शमदममदनमदमभेद- शमदमादि द्वारा-
काम- मदका नाश करनेवाला.
शरीरासक्ति- शरीर पर आसक्ति.
शरीरभाव- शरीरके विकार, शरीरही मैं हूं
ऐसा भाव
शांत, शांति- उपशम पाया हुवा, अक्षोभ
चित्त, चित्तका समाधान, मोक्षका
पूर्वसूचन.
शार्ङ्गीधर- श्रीकृष्ण.
शार्दूल- सिंह.
शालिखेत- विशिष्ट प्रकारके धान-जो सुगं-
धित होता है, खेत.
शाश्वत- नित्य, सदैव रहनेवाला अविने-
वाशी, सनातन, स्थिर, अविचल.
शास्ता- शासन करनेवाला, शासक.
शास्त्र- कर्म, उपासना, तप, यज्ञादि जीवन
विषयक प्रश्नोंका पूर्वसिद्ध
अनुभव.
शिष्टआगामविधान- शिष्टाचार, वेदोक्त
शास्त्रीय आचरण, परंपरागत
आचरण,
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