सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1165, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1165

विशुदोद्यानद्विरद- ज्ञानोयरूपी वनका
हाथी.
विद्या- जानना, वेद-विद्या, ज्ञान-दृष्टि,
शास्त्राध्ययन, आत्मज्ञानका
शास्त्र. अधिक पांचवा परिशिष्ट
देखें.
विद्यारविंदप्रबोध- विद्यारूपी कमलका
विकास करनेवाला
विद्युताग्नि- आकाशस्थ बिजलीका अग्नि.
विद्युत्त्वन- बिजलीका वन.
विधिनिषेध-विधि=जो करना है वह, निषेध
जो त्याज्य है वह, कार्याकार्य.
विधिविवर्जित-शास्त्र मर्यादाका उल्लंघन.
किया हुआ.
विनट- खेलका साथी.
विनोद्वनवाटिका- मनोविनोदके लिये
बनायी गयी जगह.
विपरीतज्ञान-अन्यथा ज्ञान. ज्ञानको अज्ञान
और अज्ञानको ज्ञान समझना.
विभुद्यवनवसंत- विद्वानोंके वनमें आया
हुवा वसंत, विद्वानोंकी विद्वत्ता
खिलानेवाला. विद्वद्वृत्तिमें बहार
लानेवाला.
विभूति- जहां ईश्वर भावका उठाव स्पष्ट
दीखता है, ईश्वरी भाव. शुचि-
साधनसंपन्न, प्रज्ञायोगादि-
संपन्न=विभूति.
विमनस्क- अन्यमनस्क, उदास, तटस्थ,
उन्मन, जिसका मनोर्लय हुवा
है वह.
विरक्त- वैराग्यसंपन्न, वासनाओंसे परा-
ङ्मुख, आत्माभिमुख, वैराग्य-
संपन्न.
विलुप्त- अदृश्य.
विवेकवल्लीका उद्यान- विवेकरूपी लताका
उपवन, अर्थात् जहां कार्याकार्य
विवेक हो.

विवेचन- मीमांसा, आलोचना, औचित्य
अनौचित्यका दर्शन.
विषयबोधविदग्ध- स्पष्ट बोध देनेमें कुशल.
विषयविद्यावधुवल्लभ-शुद्ध ब्रह्मविद्या रूपी
वधूका वल्लभ, पति.
विशेष-तुलनामें श्रेष्ठ, विशिष्ट, सर्वोत्तम
अधिक.
विश्व- जगत् सृष्टि.
विश्वतश्चक्षु- सारा विश्वही जिसकी आंखें हैं.
विश्वतोमुख- सारा विश्वही जिसका मुख है.
विश्वतः पाद्- विश्वही जिसके चरण हैं.
विश्वदभ्र- विश्वके बादल, विश्वरूपी मेघ.
विश्वबाहु- सारा विश्वही जिसके बाहू हैं.
विश्वमोहिनी- विश्वको मोहनेवाली.
विश्ववस्वप्न- यह विश्व एक स्वप्न है.
विश्वात्मकदेव- विश्वस्वरूपी देव,
जगदंतर्यामी.
विश्वोद्भवभवन-विश्व निर्मितिका स्थान.
विश्वोदरतोंदल- विश्वरूपी उदरकी तोंद.
विशद- स्पष्ट खोलकर, शुद्ध रुपसे.
विषय- इंद्रियोंके विषय.
विषयवाहिनी- विषयोंका प्रवाह.
विषयविध्वंसैकवीर-विषयोंको नष्ट करनेमें
एकैकवीर.
विषयविषजाल- विविध विषयरूपी विषका
आवरण.
विषयव्यालय - विषयरूपी सर्प, विषयरूपी
अजगर.
विसर्जन - पोछ डालनेकी क्रिया, पूजामें
विसर्जन क्रिया अंतिम होती है.
पूजामें सर्व प्रथम अपने हृदयस्थको
मूर्तिविशेषमें प्रतिष्ठा करके
अंतमें वह उसी हृदयस्थको मूर्ति-
मेसे विसर्जित कर अपने हृदयमें
वापिस बुलाया जाता हैं मूर्तिपूजा
एक प्रकारसे हृदयस्थकी पूजा हैं.

३१५ परिशिष्ट ६