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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1167

शीत- सर्द, ठंडा, शीतल.
शुक्ति- सीप.
शुचिता- पवित्रता, नीतिमत्ता, निर्विकारिता
शुभ- इष्ट, भला, निर्मल, सत्कार्य.
शून्य- निराकारब्रह्म, आकाश, कुछ
भी नहीं, निःशेष, अभाव,
रिक्तता.
शैलकक्षाके गह्वर- पर्वत श्रेणियोंकी गुफायें.
शोक- मोह आसक्तिजन्य व्याकुलता,
उद्वेग, अनुत्साह, पश्चात्ताप जन्य
अनुत्साह, विकारोंका परिणाम.
शोष- सूखना, शुष्क, सूखा.
शौच- पवित्रता, शुचिता, शुद्धता,
स्वच्छता.
श्रीमहालया- नेवासेका मोहिनीराज मंदिर.
श्रुति- वेद.
श्रुतिगुणगणसमुद्र- वेदोक्त गुण समुच्च-
यका सागर.
श्वशुर- ससुरा.
श्वानपिशित- कुत्तेका मांस.
-ष-
षट्कर्म- यज्ञ कराना, यज्ञ करना, वेदाध्य-
यन, वेद अध्यापन, दान और
प्रतिग्रह (दान देना लेना) ये
ब्राह्मणोंके षट्कर्म हैं.
षड्गुणचक्रवर्ति- यश, श्री, औदार्य, ज्ञान,
वैराग्य, और ऐश्वर्य ये भगवानके
छ गुण हैं, इन गुणोंका चक्रवर्ति
भगवान.
षड्गुणाधिकरण- उपरोक्त छः गुणोंका
स्थान.
षड्रसाज्ञ- छ रसोंका अज्ञ.
-स-
संकर- व्यभिचारजन्य मिश्रण, सामा-
जिक अव्यवस्था.
संकल्प-मानसिक कर्म प्रवृत्ति, मनका मूल
स्वरूप, यज्ञादिक कार्योंका संकल्प,
मनसे उत्पन्न करना.


संकल्प संध्या-मनकी संकल्प करनेकी प्रवृत्ति-
का अंत.
सकल काम पूर्णता- सभी इच्छाओंको
पूर्ण करनेवाला.
सकलमतिप्रकाश- 'सबकी बुद्धिको प्रकाश
देनेवाला.
सकलायवयदर्शन-अवयवोंका दर्शन. सभी
संपूर्ण दर्शन.
सकलैश्वर्यसुख-सभी प्रकारके ऐश्वर्यका सुख
सकाम- इच्छायुक्त, फलेच्छासे कर्म करने
वाला. विजयेच्छायुक्त.
सख्य- नवधाभक्तिमें आठवे प्रकारकी
भक्ति.
संग- आसक्ति, संबंध, अनुराग, कर्म-
संग, गुणसंग, जनसंग, मुक्त-संग
संगदोष, संग, आसक्तिसे दोष
निर्माण होते हैं, कर्म फलास-
क्तिसे जैसे साधक कर्म बंधनमें
आता है वैसे ही कर्मासक्तिसे भी,
संगमस्थान-ऐक्य स्थान.
सगबगाना-सराबोर हो जाना, भीग जाना,
तर हो जाना, परिपूर्ण हो जाना.
संग्रह- संचय, एकत्र करना, फूटने न देना
सही दिशामें रखना, दुरूपयोग
न होने देना, परिग्रह.
संघात- समष्टि, नियम, वृंद, समवाय.
सज्जनवनचंदन-सज्जन रूपी वनमें चंदन
के समान.
सत्- भला, सत्कर्म ब्रह्मवाचक शब्द,
ॐ तत् सत्में अंतिम तत्व,
केवल शुभ.
सत् असत्का प्रश्रय-वह तत्व जो सत्
असत् का द्वंद्व नहीं था तब भी
इन दोनोंका आश्रय रूप था.
संत- सत्पुरुष, सदैव सर्वहित.
कामना करनेवाले, सदैव टिकने-
वाला ईश्वर भक्त, ज्ञानी, योगी,
तत्वदर्शी, सदसद्विवेक रखनेवाला


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परिशिष्ट ६