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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1164

लसितकंचन- तेजस्वी, सोना.
लालनकील- लालन पालन करनेकी क्रीडा
करनेवाला.
लिंग- चिन्ह, लक्षण, आराध्यदैवत,
शिवलिंग.
लिंगदेहकमल- वासनात्मक तत्त्वोंसे बने लिंग
देहका कमल, देह कमल. लिंग
देहके वासना तत्व १७ होते हैं.
पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय पंचप्राण
मन और बुद्धि.
लिप्त- लिपा हुआ. पुताहुवा, आसक्त.
लीलना- निगलजाना.
लीला-विलास- क्रीडाका विलास करनेवाला,
लीला सहज क्रीडायें
लुब्ध- लोलुप, मोहित, ललचाया हुवा.
लुब्धक- व्याध, बहेलिया, चिडियामार,
शिकारी.
लेंडूक- लैंड, मलकी बत्ती.
लोक- जगत, स्वर्गलोक, मृत्युलोक,
पाताललोक, त्रिलोक, अथवा
त्रिभुवन. अतल, वितल, सुतल,
तलातल, रसातल, महातल, तथा
पाताल ये सात अधोलोक और
भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महा-
लोक, जनलोक, तपोलोक तथा
सत्यलोक ये सात ऊर्ध्वलोक
मिलकर चौदा लोक अथवा चौदा
भुवन माने गये हैं.
लोकाचल- ऊर्ध्वलोकोंका शिखर.
लोकोत्तर- अलौकिक.
व
वक्त्र- मुख,
वंग- कलंक, सोनेका मल.
वंचना- धूर्तता, ठगी, छल.
वज्रकवच- अभेद्य आवरण, वज्रकी अमेद्य
पोषाक.
वज्राग्नि- वज्रासन करनेके कारण मूलबंधसे
उत्पन्न होनेवाली उष्णता.

वज्रयोग- वज्रासन जन्ययोग.
वटांकुर- वटबीजका अंकुर.
वडवानल- समुद्रके नीचे जलनेवाला प्रचंड
अग्नि.
वध्य- मारनेका विषय.
वह्नी- अग्नि.
वर्ण वपु- वर्णरूपी शरीर.
वर्णाश्रम- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र
ये चार वर्ण तथा ब्रह्मचर्य,
गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यास,
ये चार आश्रम मिलकर वर्णाश्रम
धर्म कहलाता है.
वसु- विभूति परिचयमें अष्टवसु देखें.
वाक्पूजा- शब्दरूपी पूजा.
वाग्जाल- शब्दपांडित्य.
वाग्ब्रह्म- वेद.
वाग्विलासिनी- वाणीकी क्रीडा करनेवाली.
वाचस्पति- बृहस्पति.
वांछित- जो चाहा था वही.
वार्तिक- सूत्रोंपर किये गये व्याख्यान.
विकर्म- भावनात्मक कर्म, विशेष कर्म,
यह गीताका विशेष पारिभाषिक
शब्द हैं.
विकार- प्रकृतिजन्य इंद्रिय विकार, काम,
क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर
यह षड्विकार जन्य मनोमल.
विकाराष्टक- अष्ट सात्विक भावको ही कई
स्थान पर अष्ट विकार, अथवा
विकाराष्टक कहा गया है.
विगत विषय वत्सल- विषय वासना
ओंको नष्ट करनेवालोंसे प्रेम कर-
नेवाला.
विचक्षण- चिकित्सक, आलोचक, विचार-
वान.
वितरण- बांटणा.
वितृष्णा- निरिच्छा, निरपेक्षा,
विदलित मंगलकुल- अशुभकुलोंको
समूल नष्ट किया हुवा.

ज्ञानेश्वरी २१८