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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1163

य
यजन- यज्ञ, पूजन.
यज्ञोपकरण- यज्ञके उपकरण, यज्ञके साधन.
युक्तित्रय- योगका पारिभाषिक शब्द, तीन
बंध, मूलबंध, जालंधरबंध,
तथा उड्डियानबंध.
यूप- यज्ञका एक स्तंभ.
योग- कर्म-कुशलता, सिद्धांतोंको व्यव-
हारमें लानेकी कला, फल
वासना त्याग द्वारा. कर्ममें
ही एकाग्रताका अभ्यास व
तज्जन्य कर्म-समाधि, समाधिकी
परिपक्वता; स्थित प्रज्ञता, ईश्वर
प्राप्तिके लिये एकाग्र साधना,
आत्मदर्शनोपायसाधन, आत्म-
ज्ञाननिष्ठ समर्पणजन्य निष्काम
कर्मयोग, यज्ञादि कर्माचरणानुष्ठान,
चित्तवृत्तिनिरोध, समदृष्टि व
साम्यभाव, एकाग्र चित्तसे ब्रह्मानु-
संधान, समत्व भावसे ईश्वरसे
जुडना, ईशत्व प्राप्तिकी सिद्धि,
ईश्वर तुल्य होकर समत्व सिद्धि,
योग समुच्चय कर्म भक्ति ज्ञान
द्वारा आनंद प्राप्ति, ईश्वरी
शक्तिका आविर्भाव, सदैव
ब्रह्मानुसंधान, ब्रह्मलीन समरसता.
योग-क्षेम- सर्वस्व ईश्वरार्पणकी प्रेरणा,
इससे जो साधकके पास नहीं है
और उसके लिये जिसकी
आवश्यकता है वह परमात्म-
कृपासे मिलेगा और जो उसके
पास है और साधकके लिये
आवश्यक है उसकी रक्षा परमात्मा
करेगा यह भाव.
योगाब्जिनीसरोवर- योगरूपी कमल
उगनेवाला सरोवर.
योगी- कर्मयोगी जो न करनेका सा करता
रहता है, कर्मजन्य थकानसे
मुक्त, कर्मयोगीका प्रत्येक
श्वास और धडकन ईश्वरो-
पासना होती है, सदैव सर्वत्र
ईश्वरानुभव जन्य साम्यता
और एकाग्रता इसका परिपाक
है. ध्यानयोगी ध्येयसे समरस हुआ
साधक, जहां ध्येय और ध्याता
ऐसा द्वैत नहीं रहा, ध्येयरत
ध्येय-लीन, सगुण-निर्गुण उपासक
ज्ञानयोगी, ज्ञेयसें समरस हुआ
ज्ञानी. सदैव सर्वत्र ज्ञेयरत ज्ञेय
लीन, भक्त-योगी; नित्य भगवद्रू-
पमें भक्तिरत भक्त.

र
रत-तन्मय, लीन, किसीमे डूबा हुआ.
रथ्योदक-रास्ते पर बहनेवाला नालोंका पानी.
रव- शब्द.
रविचंद्रराहुमेल- सूर्यचंद्रग्रहण.
रश्मिकर- सूर्य.
रश्मिजाल- किरणोंका जाला.
रस- आर्द्रता, पानी, औषध, रसायन, अन्नके
रुचिके छह प्रकार-षड्रस,
अंतःकरणमें उत्पन्न होनेवाले
वृत्तिरूप भावरस नवरस, पतला
पदार्थ, पारद पांच विषयोंमें एक
जिव्हाका विषय.
रसाई- प्रवेश, पैठ.
रसायन- भस्मादि पौष्टिक औषधविशेष.
रसोईदार- रसोई बनानेवाला.
रातोत्पल- लालकमल.
रुतना- गढना, घुसना, रुझना.
रूख- वृक्ष, पेड.
रोमबीज- बालका मूल.
रोमांच- अष्ट सात्विक भावमे एक.

ल
लगन- प्रवृत्ति, रुचि, एकाग्रता, चाह.

२१७ परिशिष्ट ६