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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

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पृष्ठ 1162

मदत्रय- कुलमद, विद्यामद, धनमद.
मंत्र-युक्ति, विशेषशक्तिसंपन्न ऋषिमुनियोंका
वाक्य, यशका प्रेरक विचार वेदमंत्र
मदांध-मदके कारण अंध, मदमें चूर
मंदराचल-मंदार पर्वत
मध्यमा- सुषुम्नानाडी, चार वाणियोंमें
कंठस्थ तीसरी वाणी.
मध्यमा मध्यविवर - सुषुम्नानाडीके
बीचमेंसे.
मनपवनखिलौना - मन और प्राणनिरो-
धका खिलौना .
मन- संकल्प कल्प करनेवाली शक्ति,
अंतःकरण सामान्य, इंद्रिय व
बुद्धिके बीचका जोड, विका-
राश्रय, मननकारी, मन+बुद्धि
चित्त,चित्तका विकाराश्रित घटक.
मनशुद्धि- मनकी निर्मलता, चित्तशुद्धि.
मनसोक्त- यथेच्छ, स्वैर विहार.
मनौती-मन्नत, मानना, देवपूजा.
ममता- अपनापन, प्रेम, वात्सल्य,
कर्मसंग, परिग्रहका अपनापन.
मरगज- एक प्रकारका रत्न, हरे रंगका.
मलत्रय- आणवमल, माथामल, कार्मक-
मल इन मलोंके कारण अनेक-
त्वका आभास होता है.
महज- केवल.
महदहंबुद्धि-महत्+अहं+बुद्धि.
महदाकाश-महत्तत्वका विश्रांतिस्थान, जहां
महत्तत्व लीन होता है वह.
महादिक- शरीरमें महत्तत्वसे स्थूल शरीरतक
महार्णवसिंधु- मोहरूप समुद्र जो लहरें
मारता रहता हैं.
महाकालकाल जो महाकालका भी काल है.
महातेजमहार्णव-महान तेजका महासागर.
महोदधि- महासागर.
मांझी- नांव खेनेवाला मल्लाह,.
माझा- मूल ज्ञानेश्वरीका मराठी शब्द,
अर्थ मेरा, प्रासके लिये अनिबर्य
होनेसे लिया गया है.

मात्रात्रय- ॐ अ, उ, म्.
माया- आभास निर्माण करनेवाली
ईश्वरीशक्ती, अज्ञान, जीवोंका
अंधार, अविद्या, अज्ञान.
मारुत- वायु. जब प्राणवायु निकलकर
गगनमें विलीन हो जाता है उस
स्थितिमें कुंडलिनी मारुत
कहलाती है.
मिस- निमित्त, बहाना.
मीलनोन्मीलन-खुलना रुकना बारबार
खोलना और बंद करना.
मुकुल - कमलकली.
मुदित-प्रसन्न.
मुद्री- मूल मराठी शब्द, प्रासके लिये
लिया गया. मुद्रिका अंगूठी.
मुमुक्षु- मोक्षकी इच्छ करनेवाला.
मूर्धन्य- मस्तक,
मूर्धन्याकाश- मस्तककी रिक्तताम.
मेखला- कटिसूत्र, कमरबंध.
मेघ- यज्ञ.
मेधा- बुद्धि, धारणाशक्ति, स्मरणशक्ति.
मोक्ष- संतिम पुरुषार्थ तिरालंब शास्वत
आनंदकी स्थिति, जीवन-मोक्ष,
मरणोत्तर मोक्ष, देहरहित
परिशुद्धि, ब्रह्मनिर्वाण
मोघ- पाप.
मोह- भ्रम, कर्त्तव्यनिर्णयमें आसक्ति-
जन्य मोह, स्वर्ग नरक सुकृत-दुष्कृ-
तादि द्वंद्वजन्य मोह, कर्तव्य-पराङ्-
मुखताका मोह, अनिश्चय या
स्वधर्म त्यागका संस्कारजन्य मोह,
पापकारी मोह, भूतवैषम्यजन्य
मोह; मानवोंमे ईश्वरका ग्रहण न
करने देनेवाला मोह, तमरूपी
जडताजन्य मोह, भेदबुद्धिजन्य
मोह, ऐसे अन्य अनेक प्रकारके
मोह वासनाओं के कारण होते हैं.

ज्ञानेश्वरी २१६