ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1161, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंपासक, भक्तके गुणोंका उपासक,
आर्तभक्त, जिज्ञासुभक्त, अर्थार्थी
भक्त, ज्ञानी भक्त,
भक्तभावभुवनदीप- भक्तके प्रेमरूपी
घरका दीपक.
भक्तानुग्रह- भक्तपर अनुग्रह, भक्त
वत्सलता.
भक्ति- ईश्वरसे निस्सीम और निष्काम
प्रेम, ईश्वरोपासना, अनन्य-
भक्ति, पराभक्ति, अव्यभिचारी
भक्ति, अद्वैतभक्ति, सहजभक्ति,
श्रवणभक्ति, कीर्तनभक्ति, स्मरण-
भक्ति, पादसेवनभक्ति, अर्चन-
भक्ति, वंदनभक्ति, दास्यभक्ति,
सख्य आत्मनिवेदनभक्ति.
भर्ता- भरण-पोषण करनेवाला, भार वाहन
करनेवाला, सहायक.
भवतरु, भवद्रुम- संसाररूपी वृक्ष.
भवद्रुमबीजिका-- संसार वृक्षका बीज.
भवभंवर-- संसाररूपी भंवरा संसारका चक्कर.
भवेभ कुंभभंजनं-- संसाररूपी हाथीका
मर्मस्थल, गंडस्थल भेद करनेवाला.
भातुक- मूल ज्ञानेश्वरीका मराठी शब्द.
खाना, खानेकी वस्तु, मिठाई.
भानु- सूर्य.
भाव- स्थिति, अस्तित्व, भक्ति, श्रद्धा,
कल्पना, अभिप्राय, वस्तु, पदार्थ
भावार्थ गूढार्थ, अष्ट-सात्विक-भाव,
अनन्यभाव, अहंभाव, धर्म-भाव,
नम्रभाव, ब्रह्म-भाव, मूढ भाव,
शिष्य भाव, सहज-भाव, स्वभाव
तात्पर्य, आविर्भाव, पूर्वजन्मकृत
संस्कार अन्य-भाव, तत्त्व, ब्रह्म.
भावना- बुद्धिकी वह अवस्था अभ्याससे
जो छीजगयी हो, सगबगा गयी
हो, चित्तवृत्ति, मनकी एक शुद्ध
अवस्था, आदि.
भावशुद्धि- अंतःकरण शुद्धि.
भास- अस्पष्ट दीखना, अल्पसा दीखना,
झलकना, थोडे समयके लिये
दीखना, भ्रमात्मक संवेदना.
भास्कर- सूर्य.
भुवनोद्भवारंभस्तंभ-स्वर्ग मृत्यु आदि
भुवनोंकी उत्पत्तिका आधार स्तंभ
भूतचतुष्टय- भूत=प्राणिमात्र भूत+चतुष्टय
चार प्रकारके प्राणि, उद्भिज,
स्वेदज, अंडज, जारज, इसे
योनिचतुष्टय अथवा भूतचतुष्टय
कहा जाता है, या पृथ्बी, आप,
तेज, वायु, आकाश नही दीखता
इसलिये अस्वीकार्य.
भूतभावना- भूत अथवा जगतकी कल्प-
नाका आश्रय, भूतोंका रक्षण
करनेवाला.
भूताभास- जगतका आभास.
भेद- प्रकार, रहस्य, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ भेद,
बुद्धिभेद, भंग, तोड गिराना,
अंतर भिन्नता.
भेदाभेदवतम- भेद अभेदका अंधःकार.
भोक्ता- भोगनेवाला, भोगनेका अधिकारी.
भोक्तृत्व- भोगना, अनुभवना.
भोग- सुखदुःखानुभव, कर्मफलभोग,
ऐहिक पारलौकिक. विषयभोग,
राज्यापभोग ऋद्धि सिद्धीके योग-
भोग, आध्यात्मिक आनंद भोग.
भ्रूलता-भौवें.
म
मकरंद-मधु, शहद.
मकारांतसोपान, - योगमार्गका आज्ञाचक्र
मख,-यज्ञ.
मंगलमणिभिधान-कल्याणरूपी रत्नोंकी खान
मज्जा-शरीरगत धातुविशेष.
मठ- मटका.
मणिज- अंडज, अंडोमेंसें उत्पन्न होनेवाले
जीव
मद-गर्वातिरेक, उन्मत्तता, उन्माद, धुंध
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