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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1160

(कर्म) फलसंयोग-कर्मसे उसके परिणामोंको
जोड़ देना.
फुरहर-स्फूर्त, स्फुरण, उद्भूत, निकलना
निष्पन्न होता.
फुरसै-रेंगनेवाला एक जहरीला जंतु जो
काटनेसे बडा कष्ट होता है, कभी
कभी आदमी मर भी जाता है.
ब
बछनाग-एक प्रकारका जहर, जो पहले मीठा
लगता है.
बंजर-ऊसर भूमि.
बंधनवार-तोरण, घरके दरवाजेके चौखटमें
घरके सामने फूल पत्तियां आदि
बांधकर सजाना.
बद्ध-बंधा हुवा, बंधित, बंदी.
बहुधाकार अनेक आकार प्रकार.
बहुश्रुत-जिसने बहुत सुना हो, अनेक
विषयोंका जानकार.
बहेलिया-व्याध, चिडियामार, क्रूरकर्मी.
बाह्यावर्ती-बाहरका, बहिरंग,
बिजुका-पशु पक्षियोंको डरानेके लिए
खेतमें खडी की जानेवाली
काली हांडी.
बिंदु-शून्य,
बिल्लौर- स्फटिक, पारदर्शक पत्थर, स्वच्छ
शीशा.
बीज-धर्म, रहस्य, बीजशक्ति, प्रत्येक प्राणि-
मात्रके विषयमें जो ईश्वरी-संकल्प
है वह, प्रेरणा. प्रत्येक मानवी
शक्ती तथा मानवमें स्थित
दैवी शक्तीकी छिपी संभावना,
चिदाभास, चेतनास्पर्श.
बुद्धि- विवेकशक्ति, समझ, आत्मौपम्य
बुद्धि. भेद-बुद्धि, मनोबुद्धि,
ममत्व-बुद्धि योग-बुद्धि, व्यवसा-
यात्मिका-बुद्धि, समत्व-बुद्धि,
सांख्य-बुद्धि, स्थिर-बुद्धि, हत-बुद्धि
हीन-बुद्धि, आत्माभिमुखबुद्धि,
भावना, वृत्ति, प्रकृतिगत बुद्धि-
तत्त्व, आकलनशक्ति, कल्पना-
शक्ति, चिंतनका इंद्रिय, समर्पण-
बुद्धि.
बुद्धिनाश- संशयाकुल बुद्धि अस्थिरबुद्धि,
स्वार्थाभिमुखबुद्धि, परमात्मविमुख
बुद्धि, ये हतबुद्धिके, बुद्धिनाशके
लक्षण.
बोध- आकलन, ज्ञानकी जागृति,
अनुभूतिजन्य ज्ञान.
बोधार्क- बोधरूपी सूर्य.
ब्रह्म- बृहत् बडा, इतना बडा और कुछ
भी न हो, सर्वव्यापक, जगतका
मूलकारण परमात्मतत्व, सगुण
ब्रह्म, जो ईश्वरार्पण बुद्धिसे कर्म
करता है, कर्मोहंताका नाशक
निर्गुण ब्रह्म सर्वव्यापक बनकर
सोऽहंभावका शान्त आनंद,
देता है.
ब्रह्मानंद- ब्रह्मानुभूतीका आनंद, सोऽहं-
भावका आनंद, तत्वमसिक्रा
आनंद, ब्रह्मसमरसैक्यका आनंद.
ब्रह्मकर्म- अध्ययन अध्यापनादि ज्ञानसा-
धनाके ब्राह्मण कर्म, शांति क्षमादि
शमदमावि ब्राह्मणोंका ब्रह्मकर्म है.
ब्रह्मचर्य- ब्रह्म जिज्ञासा तथा ब्रह्मचिंतनसे
उसी उद्देश पूर्तिकाके लिये की
जानेवाली सर्वेंद्रियसंग्रमपूर्वक
ध्येयनिष्ठ एकात्म साधना, अनन्य
भक्ति,
ब्रह्मगोलक- ब्रह्मांड.
ब्रह्मरंध्र- योग सामर्थ्यसे जहांसे प्राण बाहर
ले जा सकते हैं वह गुप्त छिद्र.
जो मस्तकमें-तालूमें- रहता है
ब्रह्मस्थान- सहस्रदल कमल सहस्रार चक्र.
भ
भक्त- ईश्वरका भजन करनेवाला, ईश्वरसे
निष्काम प्रेम करनेवाला, ईश्वरो-
ज्ञानेश्वरी २१४