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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

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पृष्ठ 1156

निग्रही- निगमन करनेवाला। इंद्रिय, मन
तथा प्राणका निरोध करनेवाला.
निजजनाखिलमंगल- अपने भक्तोंका संपूर्ण
कल्याण करनेवाला.
निजजनमितभजनीय- नित्य अपने लोगोंकी
ओरसे भजन किये जानेयोग्य.
निजधाम- अपना स्थान, आत्मस्वरूप.
निजनिर्झरसोमकांत-आप द्रवेनेवाला सोम-
कांत मणि.
निजसुख- आत्मसुख.
नित्य- किसी न किसी रूपमें सदैव रहने-
वाला. आत्मा, ईश्वर ब्रह्म,
सदैव सतत.
नित्यकर्म- रोज किया जानेवाला संध्यादि
कर्म.
नित्यतत्व-सतत रहनेवाला तत्व, आत्मा ब्रह्म
नित्यपद- परमात्मपद.
नित्ययुक्त-सतत परमात्मासे जुडा हुवा.
नित्यनिस्तारखिलमल - जिसने सदा के
लिये अपने सभी दोष निकाल
दिये हैं, जो नित्यशुद्ध है.
निदान-मूल कारण, परिणाम.
निधान-आश्रय, आधार, निधि, कोष.
निनाद-मूल मराठी शब्द, गूंजन.
निबौंला-नीमका फल.
निमिषोन्मिष-पलकोकी हलचल.
नियतांतःकरण-संयमित-नियत-अंतःकरण.
नियोजितवितंड-निश्चित प्रकारका मिथ्या
वादविवाद, शाब्दिक तर्क या
युक्तिवाद बातूनी कला.
निरपेक्षालंकार-इच्छा रहितताके अलंकारसे
सजा हुवा.
निरवधि-अमर्याद.
निराकार-बिना किसी खास आकाराका
परमात्मा. ब्रह्म, आकाश शून्य.
निरालंब-जिसे दूसरे किसीका आश्रय न
हो, स्वयंसिद्ध. बाह्य साधना का
आश्रय टूटा हुवा. सिद्ध.
निरिच्छ-इच्छा रहित, कामना रहित.
निरुपाधिक-उपाधिरहित, देहादि बाह्य
प्रपंच रहित, संग रहित, अपने
मूल रूपका.
निरूपण-कहना, किसी पर विशेष प्रकाश
डालना, किसीका विवेचन करना.
निरोध-निग्रह, चित्त निरोधकी साधना.
योग-साधना.
निर्गुण-गुण रहित, गुणवर्जित, सत्त्वादि तीन
गुणोंसे परेका.
निर्भय-भय रहित, जिसमें भय का कारणभी
न रहा हो.
निर्मत्सर- मत्सररहित. दूसरोंका बिचार न
करके अपना कर्तव्य करनेवाला.
निर्मल- वासना रहित, काम-संकल्प रहित
अंतर्बाह्य पवित्र, त्रिकरणशुद्ध,
सात्विक चारित्र्यका, मत्सरादि
दोष रहित, अर्जुन.
निर्मोह- मोहरहित. वैषम्यभावरहित.
अनिश्चिततामेंसे निकला हुवा,
विवेकी, कार्याकार्य व्यस्थित
जाननेवाला.
निर्लिप्त- अलिप्त, लेप रहित, जैसेके वैसे
रहनेवाला, परिवर्तनके परिणामसे
रहित.
निर्विकार- विकाररहित, जन्ममरणादि विकार
रहित, कामक्रोधादि विकार रहित,
कर्तृत्वादि विकार रहित, गुणजन्य
विकार रहित, किसी भी विका-
रोंसे रहित.
निर्विकल्प- असंप्रज्ञात. बाह्य जगतका भान
रहित, अहंकार-बीज रहित.
समाधि स्थितिका अंतिम छो
निर्विकल्प समाधि. इस स्थितिमें
किसी भी प्रकारकी वासनाका बीज
भी नहीं रहता. इसलिए इस अव-
स्थाको 'निर्बीज' भी कहते हैं बीज
ही नहीं रहा तब अंकुर कहां ?

ज्ञानेश्वरी २१०