ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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[बायाँ स्तम्भ]
द्वेष- दुःखानुशायी वृत्ति, शत्रुता, मत्सर.
द्वैत- भेद, ये जीव-ईश्वर भेद, जड ईश्वर भेद, जीवोंमें परस्पर भेद, जड जीव भेद, जड-जड भेद. यह पांच प्रकारके भेद हैं अर्थात द्वैत है.
द्वैताकार- इस प्रकारके पंच भेदात्मक अनुभूति.
द्वैध- मनका द्विधा भाव, संकल्प-विकल्प, डांवाडोल मनःस्थिति.
ध
धनंजय- अर्जुन.
धरा, धरातल- पृथ्वी,
धर्म- धर्म विशेष, जिनका गीता अथवा ज्ञानेश्वरी मे चर्चा हुई है, जाति-धर्म अथवा कुल धर्म, कर्तव्या-कर्तव्य विचार, प्राप्तकर्तव्य, क्षत्रियोंका धर्मयुद्ध, फलत्यागका निष्काम कर्म, निष्ठानसार प्राप्तकर्म स्वधर्म, अभ्युदय निःश्रेयस प्रधान आचरण संहिता, यमनियमादि शुभप्रवृत्ति, पुण्याचरण, समर्पणपूर्वक सेवाका सेवाधर्म, भक्ति-वेदाध्ययनादि कर्म, भक्ति-आहार-शुद्धि, अध्ययनयज्ञ-कर्तव्य, गुण विकारात्मक नीति धर्म, विहितकर्म धर्म, परोपकार धर्म वर्ण-धर्म, धर्माधर्मचिंतन, ईश्वरशरणताका सर्व श्रेष्ठ धर्म.
धर्म निधान- धर्मका भांडार.
धसाल- अविचारी, ढीला.
धातु- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा ये सप्त धातु जिस पर शरीर टिका हुवा है.
धात्री- आधार, जन्मभूमि,
धी- ज्ञान, बुद्धि.
[दायाँ स्तम्भ]
धीर- धैर्य, धैर्यवान, धीरज, धीरजवाला
धूम- शरीरस्थ अग्निकी ज्वालाहीन स्थिति, कर्मयोग-स्फूर्तिका अभाव.
धूममार्ग- स्फूर्तिशून्य तमोमार्ग जो कर्तव्य-भावना की आगकी दवा देता है
धृति- तितिक्षा, सहनशक्ति, शरीर घटककी परस्पर चिपके रहनेकी शक्ति, कार्य चलाने प्रेरणा देनेवाली बुद्धिकी सहयोग शक्ति.
धोकटी- नायीका चमडेका थैला.
ध्यान- किसी बातको चित्तमें घुलाते रखना, चित्तै काग्रता, ईश्वर चिंतन समझना, सम्यक विचार
न
नग- पर्वत पहाड,
नग्नसुंचितमुंड- दिगंबर श्रमण,
नभ- आकाश.
नंदिनीकाबछडा- कामधेनुका बछडा.
नम- नमस्कार, नम्र, भक्तियुक्त,
नम्र- विनीत, लीन.
नवल- मूल मराठी शब्द. आश्चर्य, अचरज
नवविधवायु- पंचप्राण. प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान तथा नागकूर्म, कृकला, देवदत्त व धनंजय ऐसे पांच प्रकारके वायु हैं इसमें कोई धनंजयको नौ प्रकार के वायु मानते हैं प्राणों को वायु माना है.
नाद- ध्वनि, आवाज.
नाभीकंद- नाभीकी गांठ
निकंदन- विनाश, वध,
निकुंभ- गंडस्थल हाथीका मस्तक परका मर्मस्थान. मूल मराठी शब्द.
निगमरत्नाचल- वेदरूपी रत्नोंका पर्वत.
निगमागमद्रुमफल- वेद तथा शास्त्ररूपी वृक्षका फल.
निगूढ- न दीखनेवाला, रहस्यमय, गुप्त.
निग्रह- नियमन, इंद्रिय-दमन.
२०९ | परिशिष्ट ६