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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1154

अप्रशस्य वृत्ति, दुःखका विचार करके
प्रसन्न रहना, हीन वृत्तिका विरोध
करके भी सौम्यता, निरंतर कर्म
करते हुए आत्मचिंतन, भोग
पचा सके इतना संयम, गुणदोष
पचा सके विश्लेषण करके साम्य
भाव, यह मानस तप, ऐच्छिक
दारिद्र्य ब्राह्मणोंका तप है.
तम- अंधकार, मोह, तामस कर्म.
ताज- मुकुट शिरोभूषण.
तामस- तमोगुणी मनुष्य.
तुर्या- जाग्रति, स्वप्न, सुषुप्ति, इन तीनोंके
परेकी चौथी अवस्था.
तृष्णा- अभिलाषा, लालच, जो देखा
वह चाहिए ऐसा लगना, अप्राप्त
वस्तुकी आशा, तृष्णा.
त्याग- तजना, कर्मफल त्याग, अहंता-
ममता त्याग, स्वार्थत्याग,
स्वामित्वविसर्जन = सर्व समर्पण.
त्रिपुटी- तीनोंका पुंज, कर्ता, क्रिया, कर्म,
ध्याता, ध्यान, ध्येय, ज्ञाता,
ज्ञान ज्ञेय आदि.
त्रिभुवनगजपंचानन- त्रिभुवन रूपी गजके
लिये सिंह समान.
थ
थैमान- मूल मराठी शब्द, नंगा नाच.
थोथा- पोला, खोखला.
थोर- मूल मराठी शब्द- श्रेष्ठ.
द
दक्ष- कुशल, प्रवीण, सावधान, तत्पर.
दंडवत- सरल भूमिष्ठ होकर सर्वांग
प्रणाम करना.
दंभ- दिखावटी धर्माचरण, अहंकार
प्रदर्शन.
वृथा अभिमान, अपने विषयमें
मूढ भावना.
दया- दुखितोंके विषयमें करुणा,
दूसरोंके दुःख निवारणकी तडप,
दर्शन- दृष्टि, शास्त्र, साक्षात्कार, व्यापक,
अनुभव, प्रतिभादर्शन, प्रतीति-
दर्शन.
दर्शनानुग्रह- साक्षात्कारका अनुग्रह.
दशन- दांत.
दादुर- मेंढक.
दावानल- वनकी आग.
दिव्य- अद्भुत, प्रकाशमय, लोकोत्तर,
स्वर्गीय, देवत्व-युक्त, भावमय,
प्रतिभा.
दिव्यदृष्टि- ईश्वरप्रसादसे प्राप्त दृष्टि.
दीठ- दृष्टि.
दुभती- मूल मराठी शब्द, दूध देनेवाली
दुधाल गाय.
दुराराध्य- अत्यंत कष्टसे संतुष्ट होनेवाला,
प्राप्त होनेमें अत्यंत कठिन.
दुःख- प्रतिकूल संवेदन.
दुःखान्धि- दुःखका समुद्र.
देवः स्वर्गके इंद्रादिदेवता, सृष्टिदेवत
ईश्वरसे भिन्न अन्य दैवत, सर्व
नियंता, जिसके नियंत्रणमें अन्य
देव भी हैं, पितृरूप देवता, पूज्य
लोगोंके साथ आनेवाला आदर
सूचक शब्द.
देवतार्चन- देवपूजा.
देहरी- द्वारके चौखटकी नीचेकी लकडी.
देहहेत- देह ही मैं ऐसी भावना, देहका
अभिमान.
दैवी- ईश्वरीय, देवोका, ईश्वरनिष्ठ,
ईश्वराभिमुख.
दोष- अनर्थ, हानि, व्याधि, अनर्थ
आचार, आहारादिसे होनेवाला
अनिवार्य पाप, चित्तका मल,
विकार, पापरूप.
द्यूत- जूआ, बिना परिश्रम धन कमानेकी
वृत्ति.
द्रवना- पिघलना, गलना,
ज्ञानेश्वरी २०८