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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1152

चलितचित्तपानतुंदिल-चंचल चित्तको पी
जानेसे जिसका पेट बढ गया है।
चस्का- आदत, लत.
चांग- मूल ज्ञानेश्वरीका शब्द, भला,
अच्छा, हिंदी शब्द चंगा.
चातुर्यकलाकामिनी-चातुर्य, कलाकी देवता
सरस्वती.
चित्कला- जीवनकला.
चित्कलिक-ज्ञानरूपी ज्योति.
चिद्गगनभुवनदीप- चैतन्यरूपी आकाश
भवनका दीप.
चिदंबर-चिदाकाश-चैतन्यरूपी आकाश
चिद्रूप- चैतन्यरूप.
चिद्भ्रमर- जीवचैतन्यरूप भ्रमर.
चिन्हित- चिन्हयुक्त सांकेतिक.
चिबुक- ठोडी.
चेंड़वा- पक्षीका बच्चा.
चौड- मुंडन, विनाश
छ
छकाना- भ्रमित करना, अचंवेमें आना.
छतनार- छातासा छज्जेदार मंडप.
ज
जगडंबर- विश्व-विस्तार, विश्वकी प्रचंड
व्यापकता.
जगदखिलपालन- समग्रविश्वका पालन
करनेवाला.
जगदंबुदगर्भनभ- जगद्रूपी बादलका गर्भ
जहां संभव हो सकता है ऐसा
आकाश.
जगदादिकंद- जगतका आदि कारण.
जगदादिविश्रामधाम- जगत का उत्पत्ति-
स्थान और विश्रांतिस्थान
जगदुन्मिलना विरल- केलिप्रिय-
जगतको बारबार प्रकट करनेवाले
खेलमें रमनेवाला.
जंगम- हलचल करनेवाला सचेत न प्राणी.
जन्म- उत्पत्तिरूप प्रथम भाव विकार,
दुःख हेतु. देह धारणरूप

आविर्भाव. सर्वसाधारण जीवका
देहधारण.
जन्मकर्म- न जन्मते जन्म लेना, न करने-
का सा करना, ईश्वरका दिव्य
जन्मकर्म.
जनलीलाविलास- उत्पन्न करनेवाली
लीलाका विलास करनेवाला.
जन्मजराजलद्वालप्रभंजन- जन्म तथा
वृद्धावस्थाके बोधके जालको
नष्ट करनेवाला.
जन्यजनक- उत्पन्न होनेवाला और उत्पन्न
करनेवाला.
जलकुंभी- काई-शेवार. पानीपर आनेवाली
हरी काई.
जल्पवाद- बेकारकी बकवाद.
जलार्णव- प्रलयकालका सागर.
जितेंद्रिय- जिन्होंने अपनी इंद्रियोंपर स्वामित्व
प्राप्त किया है.
जिव्हार- मर्मस्थान, जीव, जीवनाधार.
जिव्हाला- आत्मीयता, अंतःकरण-
मूल मराठी शब्द.
जिज्ञासा- ज्ञानकी इच्छा. ईश्वर विषयक
ज्ञानकी इच्छा.
जीव- अंतःकरण, आत्म-स्वरूप,
प्राणी, अंतरात्मा, देहाभिमानी
क्षेत्री.
जीवत्व- जीवपन, साहंकार की भूमिका.
जोड़- आचरण, पान, अभ्यास, साधना,
ईश्वरसंलग्नता, जन्मतः साथ
लेना, सफल मनोरथ होता, साथ
रहना जुट जाना.
जीवन- जीना.
ज्ञाता- जाननेवाला, तत्वज्ञ, विचारक,
आत्मज्ञानी, ज्ञानत्रिपुटी में एक.
ज्ञान- अवबोध, बुद्धिमत्ता, तत्वचिंतन,
विवेक, आत्मविषयक बोध.
ईश्वरका दिव्य जन्मकर्म
जानना, आत्मानारमशान, कार्या-

ज्ञानेश्वरी २०६