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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

२. द्वितीय उद्योत: अविवक्षितवाच्य एवं विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि-भेद निरूपण

प्रथम उद्योतः १२१
ध्वन्यालोकः
अपह्नुतिदीपकयोः पुनर्वाच्यस्य प्राधान्यं व्यङ्ग्यस्य चानुयायित्वं
प्रसिद्धमेव ।
और फिर अपह्नुति और दीपक (अलङ्कारों) में वाच्य का प्राधान्य और व्यङ्ग्य का
अनुयायित्व प्रसिद्ध ही है ।
लोचनम्
चिरन्तनानामभिमत इति तात्पर्यम् । अपह्नुतिदीपकयोरिति । एतत्पूर्वमेव
निर्णीतम् । अत एवाह—प्रसिद्धमिति । प्रतीतं प्रसाधितं प्रामाणिकं चेत्यर्थः ।
पूर्वं चैतदुपमादिव्यपदेशभाजनमेव तद्यथा न भवतीत्यमुया छायया दृष्टान्त-
तयोक्तमप्युद्देशकूमपूरणाय ग्रन्थशय्यां योजयितुं पुनरप्युक्तं 'व्यङ्ग्यप्राधान्या-
भावान्न ध्वनिरि'ति छायान्तरेण वस्तु पुनरेकमेवोपमाया एव व्यङ्ग्यत्वेन
ध्वनित्वाशङ्कनात् । यत्तु विवरणकृत्—दीपकस्य सर्वत्रोपमान्वयो नास्तीति
बहुनोदाहरणप्रपञ्चेन विचारितवांस्तदनुपयोगि निस्सारं सुप्रतिक्षेपं च ।
प्राचीनों का अभिमत है, यह तात्पर्य है । अपह्नुति और दीपक में— । यह पहले
ही निर्णय कर चुके हैं । अत एव कहते हैं—प्रसिद्ध— । अर्थात् प्रतीत, प्रसाधित
एवं प्रामाणिक है । पहले तो यह 'उपमादि के व्यपदेश का भाजन ही जिस प्रकार
नहीं हो सकता' इस प्रकार से दृष्टान्त के रूप में उक्त होकर भी उद्देश क्रम की पूर्ति
के लिए एवं ग्रन्थशय्या की योजना¹ के लिए फिर भी कहा है—'व्यङ्ग्य का प्राधान्य
न होने के कारण ध्वनि नहीं है ।' प्रकारान्तर से ( अप्राधान्य रूप ) वस्तु एक ही है
इस प्रकार उपमा के व्यङ्ग्य होने से 'ध्वनि' की शङ्का नहीं । जो कि विवरणकार ने—
'दीपक का सर्वत्र उपमा से सम्बन्ध नहीं है' यह बहुत से उदाहरण—प्रपञ्च द्वारा
विचार किया है, वह उपयोगी नहीं, तथा निःसार एवं सहज ही निराकरणीय है ।
रस अर्थात् विष के दान का निषेध पर्याय या प्रकारान्तर से है व्यंग्य, किन्तु यह व्यङ्ग्य आगे
की 'तच्च रसदाननिवृत्तये' ( विषदान की निवृत्ति के लिए ) इस उक्ति से अभिहित हो जाता है ।
इस प्रकार यह पर्यायोक्त अलङ्कार है । क्योंकि अभिहित हो जाने के कारण व्यंग्य का चमत्कार
जाता रहता है ।
१. पहले 'समासोक्ति' और 'आक्षेप' के प्रसंग में यह भी सिद्धान्ततः आचार्य ने कहा था कि
व्यंग्य और वाच्य में जो चारुत्वयुक्त होने के कारण प्रधान होता है उसी के आधार पर व्यपदेश
भी होता है । इसके उदाहरणस्वरूप उन्होंने वहाँ दीपक और अपह्नुति की चर्चा की थी, जिनमें
उपमा व्यंग्य होती हुई भी प्राधान्यतः विवक्षित नहीं है । प्रस्तुत में पुनः अपह्नुति और दीपक
अलङ्कारों के उल्लेख पहले उल्लिखित अलङ्कारों के उद्देशक्रम की पूर्ति करने एवं ग्रन्थशय्या की
योजना के उद्देश्य से ग्रन्थकार ने किया है । समासोक्ति, आक्षेप, अनुक्तनिमित्त विशेषोक्ति,
पर्यायोक्त, अपह्नुति, दीपक और सङ्कर अलङ्कारों का नामोल्लेख किया है । इसी क्रम में पर्यायोक्त
के बाद अपह्नुति और दीपक की यहाँ चर्चा हुई है ।

१२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः

सङ्करालङ्कारेऽपि यदालंकारोऽलंकारान्तरच्छायामनुगृह्णाति, तदा
व्यङ्ग्यस्य प्राधान्येनाविवक्षितत्वान्न ध्वनिविषयत्वम् ।
सङ्करालङ्कार में भी जब अलङ्कार दूसरे अलङ्कार की छाया (सौन्दर्य) को
अनुगृहीत (पुष्ट) करता है तब व्यङ्ग्य के प्राधान्यतः विवक्षित न होने पर ध्वनि
का विषय नहीं होता।

लोचनम्

'मदो जनयति प्रीतिं सानङ्गं मानभञ्जनम् ।
स प्रियासङ्गमोत्कण्ठां सासह्यां मनसः शुचम् ॥ इति ॥
अत्राप्युत्तरोत्तरजन्यत्वेऽप्युपमानोपमेयभावस्य सुकल्पत्वात् । न हि
क्रमिकाणां नोपमानोपमेयभावः । तथा हि—
राम इव दशरथोऽभूद्दशरथ इव रघुरजोऽपि रघुसदृशः ।
अज इव दिलीपवंशश्चित्रं रामस्य कीर्तिरियम् ॥
इति न न भवति। तस्मात्क्रमिकत्वं समं वा प्राकरणिकत्वमुपमां
निरुणद्धीति कोऽयं त्रास इत्यलं गर्द्दभीदोहानुवर्तनेन । सङ्करालङ्कारेऽपीति ।
'मद प्रीति उत्पन्न करता है, वह (प्रीति) मान को दूर करने वाले अनङ्ग को,
वह (अनङ्ग) प्रियतमा के सङ्गम की उत्कण्ठा को और वह (उत्कण्ठा) मन के
शोक को।'
यहाँ उत्तरोत्तर उत्पन्न होने पर भी उपमानोपमेयभाव सहज ही बन सकता है। यह
नहीं कि क्रमिकों का उपमानोपमेयभाव नहीं होता। जैसा कि—
राम के सदृश दशरथ हुए, दशरथ के सदृश रघु, रघु के सदृश अज एवं अज के
समान दिलीप का वंश। इस प्रकार राम की कीर्ति आश्चर्ययुक्त है।
यहाँ (उपमानोपमेयभाव) नहीं है यह नहीं। इस लिए क्रमिकत्व, सम अथवा
प्राकरणिकत्व उपमा को रोक लेता है, यह कौन सा त्रास है ? अब गर्दभी को बार-बार
दुहना ठीक नहीं। सङ्करालङ्कार में भी— ।


१. 'लोचन' में निर्दिष्ट 'सङ्करालङ्कार' के सम्बन्ध में संक्षिप्त किन्तु स्पष्टार्थ विचार यह है कि
भामह आदि ने 'सङ्कर' के चार प्रकार गिनाए हैं, जब कि आगे चल कर उसके तीन ही प्रकार
निर्दिष्ट किए जाते हैं। तीन प्रकार हैं—अङ्गाङ्गिभावसङ्कर, एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर और सन्देहसङ्कर ।
भामह ने एकाश्रयानुप्रवेश को एकवाक्यानुवर्तन और एकवाक्यांशसमावेश इन दो रूपों में विभक्त
कर दिया है !
जैसा कि 'सन्देह' सङ्कर का उदाहरण 'सरसिजवदना' आदि है वहाँ रूपक के अनुसार समास
करने पर, कि 'शशी एव वदनं यस्याः सा' और उपमा के अनुसार समास करने पर, 'शशिवद्
वदनं यस्याः सा' रूप होंगे। तीनों विशेषण क्रमशः आकाश, जल और स्थल से सम्बन्ध होने से
नायिका का उसमें सम्भव होना बोधित होता है। यहाँ पर कोई प्रमाण नहीं जिसके आधार पर

प्रथम उद्योतः १२३
लोचनम्
विरुद्धालंक्रियोल्लेखे समं तद्वृत्त्यसम्भवे ।
एकस्य च ग्रहे न्यायदोषाभावे च सङ्करः ॥
इति लक्षणादेकः प्रकारः । यथा ममैव-
शशिवदनाऽसितसरसिजनयना सितकुन्ददशनपङ्क्तिरियम् ।
गगनजलस्थलसम्भवहृद्याकारा कृता विधिना ॥ इति ॥
अत्र शशी वदनमस्याः तद्वद्वा वदनमस्या इति रूपकोपमोल्लेखाद्युगपद्
द्वयासम्भवादेकतरपक्षत्यागग्रहणे प्रमाणाभावत्सङ्कर इति व्यङ्ग्यवाच्यतया
एवानिश्चयात्क्व ध्वनिसम्भावना । योऽपि द्वितीयः प्रकारः- शब्दार्थालङ्काराणा-
मेकत्रभाव इति तत्रापि प्रतीयमानस्य का शङ्का । यथा-‘स्मर स्मरमिव प्रियं
रमयसे यमालिङ्गनात्’ इति । अत्रैव यमकमुपमा च । तृतीयः प्रकारः-यत्रैकत्र
वाक्यांशेऽनेकोऽर्थालङ्कारस्तत्रापि द्वयोः साम्यात्कस्य व्यङ्ग्यता । यथा-
विरुद्ध दो अलङ्कारों के उपस्थित होने पर, एक ही स्थान में दोनों की स्थिति
सम्भव न होने पर और उनमें से एक को छोड़कर दूसरे के ग्रहण करने में साधक एवं
बाधक के अभाव में सङ्कर ( सन्देह सङ्कर ) होता है ।
इस लक्षण से एक प्रकार का सङ्कर हुआ । जैसे, मेरा ही-
‘शशिवदना, नीलकमलनयना, उज्ज्वलकुन्ददन्तावली इस नायिका को विधाता ने
आकाश, जल और स्थल में उत्पन्न होने वाले मनोहर पदार्थों के आकार वाली
बनाया है ।’
यहाँ शशी वदन है इसका, अथवा शशी के समान वदन है इसका, यह रूपक
और उपमा दो अलङ्कारों के उल्लेख से एक स्थान में दोनों के सम्भव न होने के
कारण तथा एकतर पक्ष के त्याग अथवा ग्रहण में प्रमाण के अभाव होने से ‘सङ्कर’
अलङ्कार है, इस प्रकार जब ‘सङ्कर’ के व्यङ्ग्य होने अथवा वाच्य होने में ही कोई
निश्चय नहीं तब इसके ‘ध्वनि’ होने की सम्भावना कैसी ? जो कि दूसरा (सङ्कर
अलङ्कार का ) प्रकार है-शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार का एकत्र भाव, वहाँ भी
प्रतीयमान की सम्भावना कैसी ? जैसे-‘काम के सदृश प्रिय को याद कर जिसे
आलिङ्गन के द्वारा तू रमाती है ।’ यहीं यमक और उपमा है । तीसरा प्रकार-जहाँ
एक वाक्यांश में अनेक अर्थालङ्कार हैं, वहाँ भी दो के बराबर होने से किसकी व्यङ्ग्यता
होगी ? जैसे-
यह माना जाय कि उपमा और रूपक में से कोई एक है। इस प्रकार यहाँ दोनों का सन्देह रूप
सङ्कर है।
दूसरा प्रकार है, शब्द और अर्थ के अलङ्कारों का एक वाक्य में प्रवेश । तीसरा प्रकार है एक
वाक्यांश में अनेक अर्थालङ्कार । द्वितीय प्रकार के उदाहरण में ‘स्मर-स्मर’ इस आवृत्ति से यमक
( शब्दालङ्कार ) है और ‘स्मर’ ( काम ) के सदृश’ ( स्मरमिव ) यह उपमा ( अर्थालङ्कार ) । इस
प्रकार दोनों का एकाश्रयानुवेश है । तीसरे प्रकार के उदाहरण में सूर्य स्वामी है और वासर सेवक
हैं । सूर्य का अस्त होना स्वामी पर विपत्ति है और वासर का तमोगुहा में प्रवेश समुचित

१२४सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम्
तुल्योदयावसानत्वादृतेऽस्तं प्रति भास्वति ।
वासाय वासरः क्लान्तो विशतीव तमोगुहाम् ॥ इति ॥
अत्र हि स्वामिविपत्तिसमुचितव्रतग्रहणहेवाकिकुलपुत्रकरूपणमेकदेशविव-
र्त्तिरूपकं दर्शयति । उत्प्रेक्षा चेवशब्देनोक्ता । तदिदं प्रकारद्वयमुक्तम् ।
शब्दार्थवर्त्त्यलङ्कारा वाक्य एकत्र वर्त्तिनः ।
सङ्करश्चैकवाक्यांशप्रवेशाद्वाऽभिधीयते ॥ इति च ॥
चतुर्थस्तु प्रकारो यत्रानुग्राह्यानुग्राहकभावोऽलङ्काराणाम् । यथा—
प्रवातनीलोत्पलनिर्विशेषमधीरविप्रेक्षितमायताक्ष्या ।
तया गृहीतं नु मृगाङ्गनाभ्यस्ततो गृहीतं नु मृगाङ्गनाभिः ॥
अत्र मृगाङ्गनावलोकनेन तदवलोकनस्योपमा यद्यपि व्यङ्ग्या, तथापि
वाच्यस्य सा सन्देहालङ्कारस्याभ्युत्थानकारिणीत्वेनानुग्राहकत्वाद् गुणीभूता,
अनुग्राह्यत्वेन हि सन्देहे पर्यवसानम् । यथोक्तम्—
'जिसका उदय और अस्त दोनों समान ही हैं ऐसे सूर्य के अस्तङ्गत होने पर
म्लान वासर मानों अन्धकार की गुहा में प्रवेश कर रहा है।'
यहाँ ('अन्धकार की गुहा' इस स्थल का) एकदेशविवर्तिरूपक स्वामी की विपत्ति
के समय समुचित व्रतग्रहण में प्रयत्नशील कुलपुत्र के रूपण को दर्शाता है। और
'इव' शब्द से उत्प्रेक्षा उक्त है। इस सङ्कर के दो प्रकार कहे गए।
एक ही वाक्य में शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार दोनों होते हैं, यह सङ्कर है,
अथवा एक ही वाक्यांश में अनेक अर्थालङ्कारों का प्रवेश होता है तब भी सङ्कर
कहा जाता है।
चौथा प्रकार वह है अलङ्कारों का अनुग्राह्यानुग्राहकभाव होता है, जैसे—
'दीर्घ लोचनों वाली उस (पार्वती) ने वायु से हिलते हुए नीलोत्पल के सदृश अधीर
दृष्टिपात को मृगाङ्गनाओं से ग्रहण किया है अथवा मृगाङ्गनाओं ने उससे ग्रहण किया।'
यहाँ मृगाङ्गनाओं के अवलोकन से पार्वती के अवलोकन की उपमा यद्यपि व्यङ्ग्य
हो रही है, तथापि वाच्य सन्देहालङ्कार के अभ्युत्थान करने वाली होने के कारण वह
(व्यङ्ग्य उपमा) गुणीभूत है। क्योंकि अनुग्राह्य होने के कारण सन्देह में उसका
(अनुग्राहिका व्यङ्ग्य उपमा का) पर्यवसान है। जैसा कि कहा है—


व्रतग्रहण है। पर इनका आरोप नहीं हुआ है, केवल 'तमोगुहा' में एकदेशविवर्ती रूपक है।
'विशतीव' 'मानों प्रवेश करता है', यहाँ उत्प्रेक्षा है। यहाँ रूपक और उत्प्रेक्षा दोनों समानरूप
से वाच्य हैं।
चतुर्थ प्रकार है अङ्गाङ्गिभावरूप सङ्कर। उदाहरण में जो पार्वती के चञ्चल नेत्रों और हरिणी
के चञ्चल नेत्रों में जो अधीर-विप्रेक्षित के आदान-प्रदान का सन्देह कवि ने किया है वहाँ 'पार्वती
की चञ्चल आँखें हरिणी की आँखों के समान हैं, यह उपमा व्यंग्य हो रही है, किन्तु वह वाच्य
सन्देह अलङ्कार का अभ्युत्थान करती है अतः अनुग्राहक होने के कारण गुणीभूत हो गई है।
उसका पर्यवसान सन्देह में होता है।

प्रथम उद्योतः १२५
ध्वन्यालोकः
अलङ्कारद्वयसम्भावनायां तु वाच्यव्यङ्ग्ययोः समं प्राधान्यम् ।
अथ वाच्योपसर्जनीभावेन व्यङ्ग्यस्य तत्रावस्थानं तदा सोऽपि
ध्वनिविषयोऽस्तु, न तु स एव ध्वनिरिति वक्तुं शक्यम् । पर्यायोक्त-
निर्दिष्टन्यायात् ।
दो अलङ्कारों की सम्भावना में तो वाच्य और व्यङ्ग्य का प्राधान्य बराबर
है । यदि कहिये कि वाच्य को गुणीभूत करके व्यङ्ग्य का वहाँ अवस्थान है तब
वह भी 'ध्वनि' का विषय हो सकता है, न कि वही 'ध्वनि' है, ऐसा कह सकते
हैं । जैसा कि 'पर्यायोक्त' में ढंग दिखा चुके हैं ।
लोचनम्
परस्परोपकारेण यत्रालङ्कृतयः स्थिताः ।
स्वातन्त्र्येणात्मलाभं नो लभन्ते सोऽपि सङ्करः ॥
तदाह-यदालङ्कार इत्यादि । एवं चतुर्थेऽपि प्रकारे ध्वनिता निराकृता ।
मध्यमयोस्तु व्यङ्ग्यसम्भावनैव नास्तीत्युक्तम् । आद्ये तु प्रकारे 'शशिवदने'त्या-
युदाहृते कथञ्चिदस्ति सम्भावनेत्याशङ्क्य निराकरोति—अलङ्कारद्वयेति ।
सममिति । द्वयोरप्यान्दोल्यमानत्वादिति भावः । ननु यत्र व्यङ्ग्यमेव प्राधान्येन
भाति तत्र किं कर्तव्यम् । यथा—
होइ ण गुणाणुराओ खलाणं णवरं प्रसिद्धिसरणाणम् ।
किर पहिणुसइ ससिमणं चन्दे पिआमुहे दिट्ठे ॥
अत्रार्थान्तरन्यासस्तावद्वाच्यत्वेनाभाति, व्यतिरेकापह्नुती तु व्यङ्ग्यत्वेन
प्रधानतयेत्यभिप्रायेणाशङ्कते—अथेति । तत्रोत्तरम्—तदा सोऽपीति । सङ्करा-
'जहाँ परस्पर उपकार-पूर्वक अलङ्कार स्थित हैं और स्वतन्त्र रूप से आत्मलाभ
नहीं प्राप्त करते हैं, वह भी 'सङ्कर' है ।'
उसे कहते हैं—जब अलङ्कार इत्यादि— । इस प्रकार (सङ्कर) के चौथे प्रकार
में भी ध्वनित्व का निराकरणीय किया । बिचले दो प्रकारों में तो व्यङ्ग्य की
सम्भावना ही नहीं है, यह कहा । 'शशिवदना०' इत्यादि उदाहृत (सङ्कर के) पहले
प्रकार में किसी प्रकार सम्भावना है, यह आशङ्का करके निराकरण करते हैं—दो
अलङ्कारों— । बराबर— । भाव यह कि क्योंकि दोनों ही आन्दोल्यमान (सन्दिह्यमान)
हैं । जहाँ व्यङ्ग्य ही प्राधान्यतः मालूम होता है—वहाँ क्या करेंगे ? जैसे—
'केवल प्रसिद्धि पर ही ध्यान देने वाले (वस्तुतत्त्व का विचार न रखने वाले)
खल जनों के गुणानुराग नहीं होता । चन्द्रकान्त मणि चन्द्र को देखकर प्रस्रुत होता है,
प्रिया के मुख को देखकर नहीं प्रस्रुत होता ।'
यहाँ¹ 'अर्थान्तरन्यास' वाच्यरूप से मालूम पड़ता है, किन्तु 'व्यतिरेक' और
१. सामान्य का विशेष से समर्थनरूप यहाँ 'अर्थान्तरन्यास' अलङ्कार है, जो वाच्य है । क्योंकि

१२६ | सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
अपि च सङ्करालङ्कारेऽपि च क्वचित् सङ्करोक्तिरेव ध्वनि-
सम्भावनां निराकरोति ।
दूसरे यह कि सर्वत्र 'सङ्करालङ्कार' में ( कहीं भी सङ्करालङ्कार में ) 'सङ्कर'
यह कथन ही ध्वनि की सम्भावना का निराकरण कर देता है ।
लोचनम्
लङ्कार एवायं न भवति, अपि त्वलङ्कारध्वनिनामायं ध्वनेर्द्वितीयो भेदः । यच्च
'पर्यायोक्ते निरूपितं तत्सर्वमत्राप्यनुसरणीयम् । अथ सर्वेषु सङ्करप्रभेदेषु व्यङ्ग्य-
सम्भावनानरासप्रकारं साधारणमाह—अपि चेति । 'क्वचिदपि सङ्करालङ्कारे
चे'ति सम्बन्धः, सर्वभेदभिन्न इत्यर्थः । सङ्कीर्णता हि मिश्रत्वं लोलीभावः, तत्र
कथमेकस्य प्राधान्यं क्षीरजलवत् ।
अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः ।
अप्रस्तुतप्रशंसा सा त्रिविधा परिकीर्त्तिता ॥
'अपह्नुति' व्यङ्ग्य रूप से प्रधानतया मालूम पड़ते हैं, इस अभिप्राय से आशङ्का
करते हैं—यदि कहिए कि— । उस सम्बन्ध में उत्तर है—तब वह भी— ।
सङ्करालङ्कार ही यह नहीं है, अपितु अलङ्कार-ध्वनि नाम का यह 'ध्वनि' का दूसरा
भेद है । और पर्यायोक्त के प्रसङ्ग में जो निरूपण किया है वह सब यहाँ अनुसरणीय
है । अब, 'सङ्कर' के समस्त प्रभेदों में व्यङ्ग्य की सम्भावना के साधारण निरास का
प्रकार कहते हैं—'कहीं भी सङ्करालङ्कार में' यह वाक्य का सम्बन्ध है, अर्थात् सब
भेदों से भिन्न ( सङ्कर के किसी भेद में ) । क्योंकि सङ्कीर्णता अर्थात् मिश्रित होना,
लोलीभाव ( बिल्कुल एक में मिलकर एकाकार हो जाना ) है । वहाँ क्षीर और जल की
भाँति एक ही प्रधानता कैसे होगी ?
'अधिकार ( प्रस्तुतत्व ) से रहित ( अप्रस्तुत ) अन्य वस्तु की जो स्तुति ( कथन या
वर्णन ) होती है उसे 'अप्रस्तुत' प्रशंसा' कहते हैं, वह तीन प्रकार की कही जाती है ।'
यहाँ प्रसिद्धि के पक्षपाती खलजनों का गुणों में अनुराग नहीं होता इस सामान्य अर्थ का समर्थन
'चन्द्रकान्त चन्द्र के दिखने पर पिघलता है, प्रियामुख के नहीं' इस विशेष अर्थ द्वारा समर्थन
अभिहित हुआ है । इससे 'प्रियामुख चन्द्र से भी ज्यादा सुन्दर है' यह 'व्यतिरेक' तथा यह चन्द्र
नहीं है प्रियामुख ही चन्द्र है यह 'अपह्नुति' व्यंग्य प्राधान्यतः प्रतीत होता है ।
१. अप्रस्तुत प्रशंसा अर्थात् अप्रस्तुत से प्रस्तुत का आक्षेप । तात्पर्य यह कि अप्रस्तुत अभिधीय-
मान होता है और प्रस्तुत प्रतीयमान । किन्तु इतने से 'ध्वनि' का प्रसंग उपस्थित नहीं होता,
बल्कि अभिधीयमान से प्रतीयमान में अधिक चारुत्व होना चाहिए, तत्प्रयुक्त प्राधान्य होना
चाहिए । अप्रस्तुत प्रशंसा के तीन भेद हैं—सामान्यविशेषभावमूलक, कार्यकारणभावमूलक
( निमित्तनिमित्तिभावमूलक ) और सादृश्यमूलक । पहले दो भेदों के दो-दो रूप हैं—अप्रस्तुत
सामान्य से प्रस्तुत विशेष का आक्षेप और अप्रस्तुत विशेष से प्रस्तुत सामान्य का आक्षेप तथा
अप्रस्तुत कारण से प्रस्तुत कार्य का आक्षेप और अप्रस्तुत कार्य से प्रस्तुत कारण का आक्षेप । ये चार

प्रथम उद्योतः १२७
ध्वन्यालोकः
अप्रस्तुतप्रशंसायामपि यदा सामान्यविशेषभावान्निमित्तनिमित्ति-
भावाद्वा अभिधीयमानस्याप्रस्तुतस्य प्रतीयमानेन प्रस्तुतेनाभिसम्बन्ध-
स्तदाभिधीयमानप्रतीयमानयोः सममेव प्राधान्यम् ।
'अप्रस्तुतप्रशंसा' में भी जब सामान्य विशेष भाव से अथवा निमित्त-निमित्तिभाव
से अभिधीयमान अप्रस्तुत का प्रतीयमान प्रस्तुत से सम्बन्ध होता है तब अभिधीय-
मान और प्रतीयमान का प्राधान्य सम ( बराबर ) ही होता है ।
लोचनम्
अप्रस्तुतस्य वर्णनं प्रस्तुताक्षेपिण इत्यर्थः । स चाक्षेपस्त्रिविधो भवति—
सामान्यविशेषभावात्, निमित्तनिमित्तिभावात्, सारूप्याच्च । तत्र प्रथमे प्रकार-
द्वये प्रस्तुताप्रस्तुतयोस्तुल्यमेव प्राधान्यमिति प्रतिज्ञां करोति-अप्रस्तुतेत्यादिना
प्राधान्यमित्यन्तेन । तत्र सामान्यविशेषभावेऽपि द्वयी गतिः—सामान्यमप्राकर-
णिकं शब्देनोच्यते, गम्यते तु प्राकरणिको विशेषः स एकः प्रकारः । यथा—
अहो संसारनैर्घृण्यमहो दौरात्म्यमापदाम् ।
अहो निसर्गजिह्मस्य दुरन्ता गतयो विधेः ॥
अत्र हि दैवप्राधान्यं सर्वत्र सामान्यरूपमप्रस्तुतं वर्णितं सत्प्रकृते वस्तुनि
क्वापि विनष्टे विशेषात्मनि पर्यवस्यति । तत्रापि विशेषांशस्य सामान्येन व्याप्त-
अर्थात् प्रस्तुत का आक्षेप करने वाले अप्रस्तुत का वर्णन । वह 'आक्षेप' तीन
प्रकार का होता है—सामान्यविशेषभाव से, निमित्तनिमित्तिभाव से और सारूप्य से ।
उनमें प्रथम दो प्रकारों में प्रस्तुत और अप्रस्तुत का प्राधान्य तुल्य ( बराबर ) ही है,
यह प्रतिज्ञा करते हैं—अप्रस्तुत से लेकर प्राधान्य—इस अन्त तक । उनमें, सामान्य-
विशेषभाव में भी दो अवस्थाएं हैं—जहाँ सामान्य अप्राकरणिक है और शब्द से कहा
जाता है, तथा विशेष प्राकरणिक है और व्यञ्जित होता है, वह एक प्रकार है । जैसे—
'उफ, संसार की यह कितनी कठोरता है, उफ, आपत्तियों की यह कितनी क्रूरता
है, उफ, स्वभावतः कुटिल दैव की गतियों का पार पाना कितना कठिन है !'
यहाँ दैव ( विधाता ) का प्राधान्य सामान्यरूप अप्रस्तुत कहा जाता हुआ किसी
प्रकृत विनष्ट वस्तु के विशेष रूप में पर्यवसन्न होता है । वहाँ भी विशेष अंश के
सामान्य से व्याप्त होने के कारण व्यङ्ग्य विशेष की भाँति वाच्य सामान्य का भी
भेद तथा एक सादृश्यमूलक भेद मिलकर अप्रस्तुतप्रशंसा पाँच प्रकार की होती है । सादृश्यमूलक
के भी तीन प्रभेद किए गए हैं—श्लेषनिमित्तक, समासोक्तिनिमित्तक एवं सादृश्यमात्रनिमित्तक ।
इनमें सादृश्यमूलक भेद को छोड़कर अन्य चार भेदों में अप्रस्तुत (वाच्य) और प्रस्तुत (प्रतीयमान)
दोनों सम-प्राधान्य होते हैं । इसलिए उनमें ध्वनि का अवसर ही नहीं । किन्तु सादृश्यमूलक भेद
में जब अभिधीयमान अप्रस्तुत का अप्राधान्य और प्रतीयमान प्रस्तुत का प्राधान्य विवक्षित
होगा तब अलङ्कारध्वनि का प्रसंग होगा और यदि विवक्षित नहीं होगा तब केवल अप्रस्तुतप्रशंसा
अलङ्कार होगा ।

१२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
यदा तावत्सामान्यस्याप्रस्तुतस्याभिधीयमानस्य प्राकरणिकेन
विशेषेण प्रतीयमानेन सम्बन्धस्तदा विशेषप्रतीतौ सत्यामपि प्राधान्येन
तत्सामान्येनाविनाभावात्सामान्यस्यापि प्राधान्यम् । यदापि विशेषस्य
सामान्यनिष्ठत्वं तदापि सामान्यस्य प्राधान्ये सामान्ये सर्वविशेषाणा-
मन्तर्भावाद्विशेषस्यापि प्राधान्यम् ।
और जब सामान्य अप्रस्तुत अभिधीयमान का प्राकरणिक विशेष प्रतीयमान के
साथ सम्बन्ध होगा तब प्राधान्यतः विशेष की प्रतीति होने पर भी उसका सामान्य से
अविनाभाव (व्याप्ति) होने के कारण सामान्य का भी प्राधान्य होगा । जब कि
विशेष सामान्यनिष्ठ होगा तब भी सामान्य के प्राधान्य होने पर समस्त विशेषों का
(सामान्य में) अन्तर्भाव होने के कारण विशेष का भी प्राधान्य होगा ।
लोचनम्
त्वाद्द्व्यङ्ग्यविशेषवद्वाच्यसामान्यस्यापि प्राधान्यम् , न हि सामान्यविशेषयो-
र्युगपत्प्राधान्यं विरुध्यते । यदा तु विशेषोऽप्राकरणिकः प्राकरणिकं सामान्य-
माक्षिपति तदा द्वितीयः प्रकारः । यथा—
एतत्तस्य मुखात्कियत्कमलिनीपत्रे कणं पाथसो
यन्मुक्तामणिरित्यमंस्त स जडः शृण्वन्यदस्मादपि ।
अङ्गुल्यग्रलघुक्रियाप्रविलयिन्यादीयमाने शनै-
स्तत्रोड्डीय गतो हहेत्यनुदिनं निद्राति नान्तः शुचा ॥
अत्रास्थाने महत्त्वसम्भावनं सामान्यं प्रस्तुतम् , अप्रस्तुतं तु जलबिन्दौ
मणित्वसम्भावनं विशेषरूपं वाच्यम् । तत्रापि सामान्यविशेषयोर्युगपत्प्राधान्ये
न विरोध इत्युक्तम् । एवमेकः प्रकारो द्विभेदोऽपि विचारितः, यदा तावदित्या-
प्राधान्य है । न कि सामान्य और विशेष में एक काल में प्राधान्य विरुद्ध है ।
जब कि विशेष अप्राकरणिक प्राकरणिक सामान्य का आक्षेप करता है तब दूसरा
प्रकार है । जैसे—
(किसी मूर्ख के वृत्तान्त को कहीं से सुनकर विस्मय से कहते हुए किसी के प्रति
किसी का वचन— )
'उसके मुख से यही कितना सुना ! जो कि उस मूर्ख ने कमलिनी के पत्ते पर स्थित
जलकण को मोती समझ लिया । इससे भी ज्यादा और सुनो । जब वह जलकण को
मोती समझकर उठाने लगा तब उंगली के स्पर्श होते ही शनैः उस जलकण के विलीन
हो जाने पर 'हाय ! हाय ! उड़कर चला गया !' इस अन्तःशोक से वह कई दिनों से
नहीं सोता है !'
यहाँ अस्थान (बेजगह) में महत्त्व का सम्भावन रूप सामान्य प्रस्तुत है और
अप्रस्तुत जलबिन्दु में मणित्व का सम्भावन विशेष रूप वाच्य (या अभिधीयमान) है ।

प्रथम उद्योतः १२९
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ध्वन्यालोकः
निमित्तनिमित्तिभावे चायमेव न्यायः ।
निमित्तनिमित्तिभाव में भी यही नियम लागू होगा।
लोचनम्
दिना विशेषस्यापि प्राधान्यमित्यन्तेन १ एतमेव न्यायं निमित्तनैमित्तिकभावेऽति-
दिशंस्तस्यापि द्विप्रकारतां दर्शयति—निमित्तेति । कदाचिन्निमित्तमप्रस्तुतं
सदभिधीयमानं नैमित्तिकं प्रस्तुतमाक्षिपति । यथा—
ये यान्त्यभ्युदये प्रीतिं नोञ्झन्ति व्यसनेषु च ।
ते बान्धवास्ते सुहृदो लोकः स्वार्थपरोऽपरः ॥
अत्राप्रस्तुतं सुहृद्बान्धवरूपत्वं निमित्तं सज्जनासक्त्या वर्णयति नैमित्तिकीं
श्रद्धेयवचनतां प्रस्तुतामात्मनोऽभिव्यङ्क्तुम्; तत्र नैमित्तिकप्रतीतावपि निमित्त-
वहाँ भी, सामान्य और विशेष के युगपत् प्राधान्य १ में विरोध नहीं है, यह कहा जा
चुका है। इस प्रकार दो भेदों वाला भी पहला प्रकार विचार कर लिया गया, जब
इत्यादि से लेकर विशेष भी प्राधान्य—तक। इसी नियम को निमित्तनैमित्तिकभाव
में भी अतिदेश (लागू) करते हुए उसका द्विविधत्व दिखाते हैं—निमित्त···। कभी
निमित्त (कारण) अप्रस्तुत अभिधीयमान होकर नैमित्तिक कार्य (अप्रस्तुत) का
आक्षेप करता है। जैसे—
'जो अभ्युदय होने पर प्रसन्न होते हैं और दुःख पड़ने पर त्याग नहीं करते वे
बान्धव हैं, वे सुहृद हैं, दूसरे लोग स्वार्थपरायण हैं।'
यहाँ अप्रस्तुत सुहृद्-बान्धव रूप निमित्त को प्रस्तुत नैमित्तिक श्रद्धेयवचनता के
व्यञ्जनार्थ सज्जन के प्रति गौरव के कारण वर्णन करते हैं। वहाँ नैमित्तिक की
१. जैसा कि वृत्तिग्रन्थ का निर्देश है, अप्रस्तुतप्रशंसा के सादृश्यमूलक भेद के अतिरिक्त चार
भेदों में ध्वनि का अवसर क्यों नहीं है उसे यहाँ स्पष्टरूप से अवगत कर लेना चाहिए। अप्रस्तुत
से प्रस्तुत का आक्षेप ही 'अप्रस्तुतप्रशंसा' है। जब कोई अप्रस्तुत और प्रस्तुत अर्थात् अभिधीयमान
और प्रतीयमान में सामान्यविशेषभावरूप या निमित्तनिमित्तिभावरूप सम्बन्ध होगा तब दोनों बराबर
प्रधान होंगे। क्योंकि सम्बन्ध की स्थिति में दोनों का बराबर होना अनिवार्य है। और जब
प्रधानता समानरूप से दोनों में रहेगी तो किसी प्रकार 'ध्वनि' का प्रसंग हो नहीं सकता, क्योंकि
वाच्य के गुणीभाव और व्यंग्य के प्राधान्य की विवक्षा में ही 'ध्वनि' का प्रसंग होता है। सामान्य
और विशेष के युगपत् प्राधान्य में विरोध नहीं है, अर्थात् एक स्थान में, एक समय में दोनों प्रधान
हो सकते हैं। सम्बन्ध की बात को लेकर यह कह सकते हैं कि जब सामान्यरूप अप्रस्तुत
अभिधीयमान होगा और विशेषरूप प्रस्तुत प्रतीयमान होगा तब, क्योंकि सामान्य के अन्तर्गत
सभी विशेष आ जाते हैं (निर्विशेषं न सामान्यम् = विना विशेष के सामान्य नहीं होता), इस
प्रकार 'अविनाभाव' होने के कारण जब सामान्यरूप अप्रस्तुत अभिधीयमान का भी प्राधान्य
होगा। इसी प्रकार जब विशेषरूप अप्रस्तुत अभिधीयमान से सामान्यरूप प्रस्तुत का आक्षेप होगा
तब जिस प्रकार सामान्य का प्राधान्य होगा उसी प्रकार विशेष का भी होगा, क्योंकि सामान्य में
६ ध्व०

१३० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
प्रतीतिरेव प्रधानीभवत्यनुप्राणकत्वेनेति व्यङ्ग्यव्यञ्जकयोः प्राधान्यम् । कदा-
चित्तु नैमित्तिकमप्रस्तुतं वर्ण्यमानं सत्प्रस्तुतं निमित्तं व्यनक्ति । यथा सेतौ—
सग्गं अपारिजाअं कोत्थुहलच्छिरहिअं महुमहस्स उरम् ।
सुमरामि महणपुरओ अमुद्धअन्दं च हरजडापब्भारम् ॥
अत्र जाम्बवान् कौस्तुभलक्ष्मीविरहितहरिवक्षःस्मरणादिकमप्रस्तुत नैमि-
त्तिकं वर्णयति प्रस्तुतं वृद्धसेवाचिरजीवित्वव्यवहारकौशलादिनिमित्तभूतं मन्त्रि-
तायामुपादेयमभिव्यङ्क्तुम् । तत्र निमित्तप्रतीतावपि नैमित्तिकं वाच्यभूतं
प्रत्युत तन्निमित्तानुप्राणितत्वेनोद्धुरकन्धरोत्यात्मानमिति समप्रधानतैव
वाच्यव्यङ्ग्ययोः । एवं द्वौ प्रकारौ प्रत्येकं द्विविधौ विचार्य तृतीयः प्रकारः
परीक्ष्यते सारूप्यलक्षणः । तत्रापि द्वौ प्रकारौ—अप्रस्तुतात्कदाचिद्वाच्याच्चम-
त्कारः, व्यङ्ग्यं तु तन्मुखप्रेक्षम् । यथास्मदुपाध्यायभट्टेन्दूराजस्य—
प्रतीति में भी निमित्त की प्रतीति ही अनुप्राणक होने के कारण प्रधान हो जाती है,
अतः व्यङ्ग्य और व्यञ्जक, दोनों का प्राधान्य¹ है । कभी तो नैमित्तिक अप्रस्तुत
अभिधीयमान होता हुआ प्रस्तुत निमित्त को व्यक्त करता है। जैसे ‘सेतुबन्ध’ में—
'समुद्रमथन से पहले पारिजात वृक्ष से रहित स्वर्ग को, कौस्तुभ और लक्ष्मी से
रहित मधुसूदन (विष्णु) के वक्ष को तथा सुन्दर चन्द्र से रहित शिवजी के जटाभार
को स्मरण करता हूँ।'
यहाँ जाम्बवान् वृद्धसेवा, चिरजीवितत्व एवं व्यवहारकौशल आदि निमित्तभूत
प्रस्तुत को मन्त्रित्व में उपादेय के रूप में व्यक्त करने के लिए कौस्तुभ और लक्ष्मी
(अथवा कौस्तुभमणि की शोभा) से रहित विष्णु के वक्ष के स्मरण आदि अप्रस्तुत
नैमित्तिक का वर्णन करते हैं । वहाँ नैमित्तिक की प्रतीति में भी वाच्यभूत नैमित्तिक (?)
प्रत्युत उस निमित्त से अनुप्राणित होने के कारण अपने कन्धे को ऊपर उठाता है
(अर्थात् प्रधान होता है) । अतः वाच्य और व्यङ्ग्य की समप्रधानता ही है। इस
प्रकार दोनों प्रकारों को, प्रत्येक के दो-दो प्रभेदों के साथ विचार करके 'सारूप्य' नामक
तीसरे प्रकार की परीक्षा करते हैं । वहाँ भी दो प्रकार हैं—कभी अप्रस्तुत वाच्य से
चमत्कार होता है, व्यङ्ग्य तो वाच्य का मुँह ताकता है (अर्थात् अप्रधान होता है)।
जैसे हमारे उपाध्याय भट्टेन्दुराज का—
सभी विशेषों का अन्तर्भाव हो जाता है। यही नियम अप्रस्तुत से प्रस्तुत के निमित्तनैमित्तिकभाव
अर्थात् कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध के होने पर लागू होगा ।
१. प्रस्तुत उदाहरण में निमित्त या कारणरूप अप्रस्तुत सुहृद्-बान्धव का वर्णन है तथा उससे
प्रस्तुत नैमित्तिक या कार्य 'सुहृद्-बान्धव का श्रद्धेय-वचनत्व' आक्षिप्त होता है अर्थात् व्यञ्जन से
प्रतीत होता है । परन्तु व्यञ्जना प्रतीत होनेमात्र से ध्वनि का प्रसंग नहीं होता, बल्कि उसके
प्राधान्य के साथ अभिधीयमान का गुणीभाव भी होना चाहिए। किन्तु यहाँ अभिधीयमान
अप्रस्तुत निमित्त प्रतीयमान प्रस्तुत नैमित्तिक के अनुप्राणक होने के कारण गुणीभूत न होकर
प्रधान हो जाता है। इस प्रकार यहाँ व्यंग्य और व्यञ्जक दोनों का प्राधान्य है। इसी प्रकार आगे के

प्रथम उद्योतः १३१
लोचनम्
प्राणा येन समर्पितास्तव बलाद्येन त्वमुत्थापितः
स्कन्धे यस्य चिरं स्थितोऽसि विदधे यस्ते सपर्यामपि ।
तस्यास्य स्मितमात्रकेण जनयन् प्राणापहारक्रियां
भ्रातः प्रत्युपकारिणां धुरि परं वेताल लीलायसे ॥
अत्र यद्यपि सारूप्यवशेन कृतघ्नः कश्चिदन्यः प्रस्तुत आक्षिप्यते, तथाप्य-
प्रस्तुतस्यैव वेतालवृत्तान्तस्य चमत्कारकारित्वम् । न ह्यचेतनोपालम्भवदस-
म्भाव्यमानोऽयमर्थो न च न हृद्य इति वाच्यस्यात्र प्रधानता । यदि पुनर-
चेतनादिनात्यन्तासम्भाव्यमानतदर्थविशेषणेनाप्रस्तुतेन वर्णितेन प्रस्तुतमा-
क्षिप्यमाणं चमत्कारकारि तदा वस्तुध्वनिरसौ । यथा ममैव—
भावव्रात हठाज्जनस्य हृदयान्याक्रम्य यन्नर्तयन्
भङ्गीभिर्विविधाभिरात्महृदयं प्रच्छाद्य संक्रीडसे ।
स त्वामाह जडं ततः सहृदयम्मन्यस्त्वदुःशिक्षितो
मन्येऽमुष्य जडात्मता स्तुतिपदं त्वत्साम्यसम्भावनात् ॥
‘भाई बेताल ! जिसने तुम्हें वाणों को अर्पित किया, बलपूर्वक जिसने तुम्हें उठाया,
जिसके कन्धे पर देर तक तुम बैठे रहे, जिसने तुम्हारी पूजा भी की, उस प्रकार के
इसका स्थितमात्र में प्राणापहार करते हुए तुम प्रत्यपकार करने वालों के आगे
पहुँच जाते हो ।’
यहाँ यद्यपि सारूप्यवश कोई दूसरा कृतघ्न आक्षिप्त होता है, तथापि अप्रस्तुत
वेताल-वृत्तान्त की ही चमत्कार-कारिता है । न कि अचेतन के उपालम्भ की भाँति
यह अर्थ असम्भाव्यमान होने से हृद्य नहीं है, इस लिए वाच्य की प्रधानता है । फिर
यदि अत्यन्त असम्भाव्यमान उस ( अप्रस्तुत अर्थ ) के विशेषण वाले वर्णित अचेतन
आदि से प्रस्तुत आक्षिप्यमाण हो करके चमत्कारकारी हो तब वह वस्तुध्वनि होता है ।¹
जैसे, मेरा ही—
‘हे पदार्थसमूह, लोगों के हृदयों को हठपूर्वक आक्रान्त करके उन्हें विविध चेष्टाओं से
नचाते हुए अपने रहस्य को ढंककर जो कि तुम खेला करते हो तब भी अपने आपको
सहृदय मानने के कारण दुर्ललित जन तुम्हें ‘जड़’ कहता है, वस्तुतः वह जड़ है, पर
मैं मानता हूँ कि उसे जड़ कहना भी उसकी स्तुति है क्योंकि इस अंश में तुमसे उसकी
समानता की सम्भावना होती है ।’
उदाहरण में अभिधीयमान अप्रस्तुत नैमित्तिक से प्रस्तुत निमित्त की प्रतीति में निमित्त के
द्वारा अनुप्राणित होने के कारण वाच्यभूत नैमित्तिक की प्रधानता भी होने के कारण वाच्य और
व्यंग्य का समप्राधान्य समझना चाहिए ।
१. सारूप्य का सादृश्य के वश अप्रस्तुत से प्रस्तुत के आक्षेप में यदि अधिक चमत्कारकारी
प्रस्तुत होता है तब वहाँ वस्तुध्वनि का प्रसंग होता है। वह अप्रस्तुतप्रशंसा का स्थल नहीं है ।
यह बात भी मान्य है कि जो बात अत्यन्त असम्भव होती है उसके कथन में स्वभावतः चमत्कार

१३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
कश्चिन्महापुरुषो वीतरागोऽपि सरागवदिति न्यायेन गाढविवेकालोकतिर-
स्कृततिमिरप्रतानोऽपि लोकमध्ये स्वात्मानं प्रच्छादयँल्लोकं च वाचालय-
न्नात्मन्यप्रतिभासमेवाङ्गीकुर्वंस्तेनैव लोकेन मूर्खोऽयमिति यदवज्ञायते तदा
तदीयं लोकोत्तरं चरितं प्रस्तुतं व्यङ्ग्यतया प्राधान्येन प्रकाश्यते । जडोऽयमिति
ह्युद्यानेन्दूदयादिर्भावो लोकेनावज्ञायते, स च प्रत्युत कस्यचिद्विरहिण
औत्सुक्यचिन्तादूयमानमानसामन्यस्य प्रहर्षपरवशतां करोतीति हठादेव
लोकं यथेच्छं विकारकारणाभिर्नर्तयति । न च तस्य हृदयं केनापि ज्ञायते
कीदृगयमिति, प्रत्युत महागम्भीरोऽतिविदग्धः सुष्ठु गर्वहीनोऽतिशयेन क्रीडा-
चतुरः स यदि लोकेन जड इति तत एव कारणात्प्रत्युत वैदग्ध्यसम्भावन-
निमित्तात्सम्भावितः, आत्मा च यत एव कारणात्प्रत्युत जाड्येन सम्भाव्यस्तत
एव सहृदयः सम्भावितस्तदस्य लोकस्य जडोऽसीति यद्युच्यते तदा जाड्यमेवं-
विधस्य भावव्रातस्याविदग्धस्य प्रसिद्धमिति सा प्रत्युत स्तुतिरिति । जडादपि
'वीतराग भी सराग-जैसा' इस नियम के अनुसार कोई महापुरुष अपने अतिशय
विवेक के आलोक से फैले अन्धकार को तिरस्कृत करके भी लोगों के बीच अपने को
छिपाता हुआ, लोगों को मुखर करता हुआ, अपने में अज्ञान को स्वीकार करता हुआ,
उन्हीं लोगों द्वारा 'यह मूर्ख है' कहकर जो तिरस्कृत होता है, ऐसी स्थिति में उसका
प्रस्तुत लोकोत्तर चरित व्यङ्ग्य के रूप में प्राधान्यतः प्रकाशित होता है। क्योंकि
उद्यान, चन्द्रोदय आदि भाव ( पदार्थ ) लोगों द्वारा 'यह जड़ है' कह कर तिरस्कृत
होता है। बल्कि वह किसी विरही के मन को औत्सुक्य, चिन्ता से दुःखी करता है,
दूसरे को खुश करता है, इस प्रकार स्वेच्छा से लोगों को विकार के प्रवर्तनों द्वारा
नचाता रहता है। 'यह कैसा है' इस प्रकार कोई भी उसके भेद को नहीं समझता है,
प्रत्युत महागम्भीर, अतिविदग्ध, शोभन, गर्वहीन, अतिशय क्रीड़ा में चतुर वह
( भावव्रात = पदार्थ समूह ) लोगों द्वारा 'जड़' रूप में उस कारण उसी वैदग्ध्य के
सम्भावन रूप निमित्त से ही सम्भावित किया जाता है। जिस कारण से आत्मा को
जड़ रूप से सम्भावन किया जाय उसी कारण यदि लोग 'सहृदय' सम्भावित हैं तो उन
लोगों की, यदि 'तुम जड़ हो' तो इस प्रकार के अविदग्ध भावव्रात का जाड्य प्रसिद्ध
है, इस प्रकार स्तुति' ही है। ध्वनित होता है कि यह लोक (संसार के लोग) जड़ से
नहीं होता । इस प्रकार जहाँ अत्यन्त असम्भाव्यमान के विशेषणों से युक्त अप्रस्तुत अर्थ द्वारा
प्रस्तुत का आक्षेप करते हैं वहाँ वाच्य की अपेक्षा व्यंग्य अधिक चमत्कारकारी होगा ही ।
१. 'भावव्रात' यह उदाहरण कुछ क्लिष्ट हो गया है। यह वस्तुध्वनि का उदाहरण है। यहाँ
अभिधीयमान प्रस्तुत से अप्रस्तुत का आक्षेप है। जैसा कि अभिधीयमान प्रस्तुत है कि भावव्रात
या चन्द्र, उद्यान आदि पदार्थसमूह को लोग 'जड़' कहा करते हैं और स्वयं को 'सहृदय' कहते
हैं। उन्हें यह जब विदित नहीं कि ये पदार्थ संसार को अनेक प्रकार से नचाया करते हैं और
इस प्रकार अत्यन्त वैदग्ध्यपूर्ण हैं, ऐसी स्थिति में उन्हें 'जड़' कहना अपने को 'जड़' कहना हुआ ।
दूसरे अजड़ को 'जड़' कहना अजड़रूप जड़ की निन्दा नहीं, बल्कि स्तुति है। यह उक्त श्लोक का

प्रथम उद्योतः १३३
ध्वन्यालोकः
यदा तु सारूप्यमात्रवशेनैवाप्रस्तुतप्रशंसायामप्रकृतप्रकृतयोः सम्ब-
न्धस्तदाप्यप्रस्तुतस्य सरूपस्याभिधीयमानस्य प्राधान्येनाविवक्षायां
ध्वनावेवान्तःपातः । इतरथा त्वलङ्कारान्तरमेव । तदयमत्र सङ्क्षेपः—
जब कि केवल सारूप्यवश अप्रस्तुतप्रशंसा में अप्रकृत और प्रकृत का सम्बन्ध
है तब अभिधीयमान अप्रस्तुत सरूप का प्राधान्यतः विवक्षा न करने पर ध्वनि में
ही अन्तर्भाव है । इतरथा ( ऐसा न होने पर ) एक प्रकार का अलङ्कार ही है । तो
यह यहाँ संक्षेप है—
लोचनम्
पापीयानयं लोक इति ध्वन्यते । तदाह—यदा त्विति । इतरथा त्विति । इतरथैव
पुनरलंकारान्तरत्वमलंकारविशेषत्वं न व्यङ्ग्यस्य कथंचिदपि प्राधान्य इति
भावः । उद्देशे यदादिग्रहणं कृतं समासोक्तीत्यत्र द्वन्द्वे तेन व्याजस्तुतिप्रभृतिर-
लङ्कारवर्गोऽपि सम्भाव्यमानव्यङ्ग्यानुवेशः सम्भावितः । तत्र सर्वत्र साधारण-
मुत्तरं दातुमुपक्रमते—तदयमत्रेति । कियद्वा प्रतिपदं लिख्यतामिति भावः ।
तत्र व्याजस्तुतिर्यथा—
किं वृत्तान्तैः परगृहगतैः किन्तु नाहं समर्थ-
स्तूष्णीं स्थातुं प्रकृतिमुखरो दाक्षिणात्यस्वभावः ।
गेहे गेहे विपणिषु तथा चत्वरे पानगोष्ठ्या-
मुन्मत्तेव भ्रमति भवतो वल्लभा हन्त कीर्तिः ॥
अधिक पापी है। तो कहते हैं—जबकि— । इतरथा— । भाव यह कि अन्यथा
ही, किसी प्रकार व्यङ्ग्य का प्राधान्य न होने पर अलङ्कारान्तरत्व अर्थात् अलङ्कार-
विशेषत्व होगा । नाम-निर्देश में जो 'आदि' ग्रहण किया है, समासोक्ति० के द्वन्द्व
समास में उस कारण व्याजस्तुति प्रभृति अलङ्कार-वर्ग में भी सम्भाव्यमान व्यङ्ग्य का
अनुवेश है । वहाँ, सबका साधारण उत्तर देने का उपक्रम करते हैं—तो यह यहाँ— ।
भाव यह कि अथवा कितना पद-पद पर लिखें ! वहाँ, व्याजस्तुति, जैसे— '
'दूसरे आदमी के घर की बातों की चर्चा से क्या फायदा, फिर भी मैं चुपचाप
बैठने में असमर्थ हूँ, क्योंकि बड़बड़ाना दाक्षिणात्यों का स्वभाव है । हन्त ! हे राजन्
आपकी प्रिया कीर्ति घर-घर में, बाजारों में तथा मुहल्लों में, पानगोष्ठी में, पागल—जैसी
घूमती रहती है !'
अप्रस्तुत अभिधीयमान हैं । इससे किसी महापुरुष का लोकोत्तर चरित प्रस्तुतरूप में प्रतीत
हो रहा है । जैसे कोई वीतराग महापुरुष अपने विवेक के प्रकाश से अज्ञान के तिमिर को नष्ट
कर देता है, फिर भी अपनी महानता को छिपाए रहता है । देखकर उसे लोग 'मूर्ख' कहा करते
हैं और उसकी अवज्ञा करते हैं । यहाँ यह प्रस्तुत व्यंग्य अर्थ अप्रस्तुत वाच्य से निश्चय ही
चमत्कारकारी है । क्योंकि अप्रस्तुत वाच्य अचेतन 'भावव्रात' को लेकर कहे जाने के कारण

१३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
अत्र व्यङ्ग्यं स्तुत्यात्मकं यत्तेन वाच्यमेवोपस्क्रियते । यत्तूदाहृतं केनचित्—
आसीन्नाथ पितामही तव मही जाता ततोऽनन्तरं
माता सम्प्रति साम्बुराशिरशना जाया कुलोद्भूतये ।
पूर्णे वर्षशते भविष्यति पुनः सैवानवद्या स्नुषा
युक्तं नाम समग्रनीतिविदुषां किं भूपतीनां कुले ॥
इति, तदस्माकं ग्राम्यं प्रतिभात्यत्यन्तासभ्यस्मृतिहेतुत्वात् । का चानेन
स्तुतिः कृता ? त्वं वंशक्रमेण राजेति हि कियदिदम् ? इत्येवंप्राया व्याजस्तुतिः
सहृदयगोष्ठीषु निन्दितेत्युपेक्ष्यैव ।
यस्य विकारः प्रभवन्नप्रतिबन्धस्तु हेतुना येन ।
गमयति तमभिप्रायं तत्प्रतिबन्धं च भावोऽसौ ॥ इति ।
अत्रापि वाच्यप्राधान्ये भावालङ्कारता । यस्य चित्तवृत्तिविशेषस्य सम्बन्धी
वाग्व्यापारादिर्विकारोऽप्रतिबन्धो नियतः प्रभवंस्तं चित्तवृत्तिविशेषरूपमभिप्रायं
येन हेतुना गमयति स हेतुर्यथेष्टोपभोग्यत्वादिलक्षणोऽर्थो भावालङ्कारः । यथा—
एकाकिनी यदबला तरुणी तथाहमस्मिन्गृहे गृहपतिश्च गतो विदेशम् ।
यहाँ जो स्तुति रूप व्यङ्ग्य है उससे वाच्य ही उपस्कृत होता है । जो कि किसी ने
उदाहरण दिया है—
'हे राजन, पहले पृथ्वी तुम्हारी पितामही हुई, इसके बाद तुम्हारी माता हुई,
इस समय समुद्र की रशना वाली यह कुलोत्पत्ति के लिए तुम्हारी पत्नी है और जब
सौ वर्ष पूरे हो जायेंगे तब यह तुम्हारी अनिन्द्य पुत्रवधू ( पतोहू ) हो जायगी । क्या
समग्र नीतियों के जानकार कुल में यह ठीक कहा जा सकता है ?'
यह (उदाहरण) हमें ग्राम्य लगता है, क्योंकि यह अत्यन्त असभ्य स्मृति को उत्पन्न
करता है । और भी, इससे स्तुति ही क्या की ? 'तुम खान्दानी राजा हो' यह कितनी
स्तुति है ! इस प्रकार की व्याजस्तुति सहृदय जनों की गोष्ठियों में निन्दित होने के
कारण उपेक्षणीय ही है ।
'जिसका विकार अप्रतिबन्ध (नियत) होता हुआ जिस हेतु से उस अभिप्राय को
तथा उसके प्रतिबन्ध को व्यञ्जित करता है वह 'भाव' है ।'
यहाँ भी वाच्य का प्राधान्य होने पर भावालङ्कारता है । जिस चित्तवृत्ति विशेष
का सम्बन्धी वाग्व्यापार आदि विकार अप्रतिबन्ध अर्थात् नियत होता हुआ उस
चित्तवृत्ति विशेष रूप अभिप्राय को जिस हेतु से व्यञ्जित करता है वह हेतु अर्थात्
यथेष्ट उपभोग्यत्वादि रूप अर्थ (मैं तुम्हारे यथेष्ट उपभोग के योग्य हूँ, कोई प्रतिबन्धक
नहीं है, इस प्रकार का नायिका के मनोगत आदि अर्थ) 'भावालङ्कार' है । जैसे—
'इस घर में जो कि मैं अकेली अबला तथा तरुणी हूँ, घर के मालिक परदेस गये हैं ।
गुणीभूत हो जाता है । इस प्रकार वाच्य के गुणीभाव और व्यंग्य के प्राधान्यतः प्रतीत होने के
कारण यहाँ वस्तुध्वनि है, न कि अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार है ।

प्रथम उद्योतः १३५
ध्वन्यालोकः
व्यङ्ग्यस्य यत्राप्राधान्यं वाच्यमात्रानुयायिनः ।
समासोक्त्यादयस्तत्र वाच्यालङ्कृतयः स्फुटाः ॥
व्यङ्ग्यस्य प्रतिभामात्रे वाच्यार्थानुगमेऽपि वा ।
न ध्वनिर्यत्र वा तस्य प्राधान्यं न प्रतीयते ॥
वाच्य मात्र का अनुगमन करने वाले व्यङ्ग्य का जहाँ अप्राधान्य है, वहाँ
समासोक्ति आदि अलङ्कार स्पष्ट हैं । व्यङ्ग्य की सिर्फ प्रतिभा (आभास) हो अथवा
वह वाच्य अर्थ का अनुगम करे अथवा जहाँ व्यङ्ग्य का प्राधान्य प्रतीत नहीं होता
लोचनम्
कं याचसे तदिह वासमियं वराकी श्वश्रूर्ममान्धबधिरा ननु मूढ पान्थ ॥
अत्र व्यङ्ग्यमेकैकत्र पदार्थे उपस्कारकारीति वाच्यं प्रधानम् । व्यङ्ग्यप्रा-
धान्ये तु न काचिदलङ्कारतेति निरूपितमित्यलं बहुना ॥
यत्रेति काव्ये । अलङ्कृतय इति । अलङ्कृतित्वादेव च वाच्योपस्कारक-
त्वम् । प्रतिभामात्र इति । यत्रोपमादौ म्लिष्टार्थप्रतीतिः । वाच्यार्थानुगम इति ।
वाच्येनार्थेनानुगमः समं प्राधान्यमप्रस्तुतप्रशंसायामिवेत्यर्थः । न प्रतीयत
इति । स्फुटतया प्राधान्यं न चकास्ति, अपि तु बलात्कल्प्यते, तथापि हृदये
नानुप्रविशति । यथा—'देआ पसिअणिआतासु' इत्यत्रान्यकृतासु व्याख्यासु ।
तेन चतुर्षु प्रकारेषु न ध्वनिव्यवहारः सद्भावेऽपि व्यङ्ग्यस्य अप्राधान्ये म्लिष्ट-
हे मूढ़ पथिक ! किससे रहने के लिए स्थान मांगते हो, यह मेरी सास अन्धी भी है
और बहरी भी ।'
यहाँ व्यङ्ग्य एक-एक पदार्थ में उपस्कारकारी है, अतः वाच्य प्रधान है, व्यङ्ग्य
के प्रधान होने पर भी कोई अलङ्कारता नहीं, यह निरूपण कर चुके हैं, बहुत
कहना व्यर्थ है !
जहाँ— । काव्य में । अलङ्कार— । अलङ्कार होने से ही वाच्य का उपस्कारकत्व
है । प्रतिभामात्र— । जहाँ उपमा आदि में मलिन (अस्पष्ट) अर्थ की प्रतीति है ।
वाच्य अर्थ का अनुगम— । अर्थात् वाच्य अर्थ के साथ अनुगम; बराबर प्राधान्य, अप्र-
स्तुतप्रशंसा की भाँति । प्रतीत नहीं होता है— । स्फुट रूप से प्राधान्य भासित नहीं
होता है, अपितु बलात् कल्पित किया जाता है, तथापि हृदय में अनुप्रविष्ट नहीं
होता । जैसे 'प्रार्थये तावत् प्रसीद ०' इस गाथा में दूसरों द्वारा की गई व्याख्याओं में ।
अतः चार प्रकारों में व्यङ्ग्य के रहते हुए भी 'ध्वनि' का व्यवहार नहीं होता है,
(१) व्यङ्ग्य के अप्राधान्य में, (२) व्यङ्ग्य की मलिन या अस्पष्ट प्रतीति होने
पर, (३) वाच्य के साथ बराबर प्राधान्य होने पर और (४) अस्फुट प्राधान्य के

१३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
तत्पराववेव शब्दार्थौ यत्र व्यङ्ग्यं प्रति स्थितौ ।
ध्वनेः स एव विषयो मन्तव्यः सङ्करोज्झितः ॥
तस्मान्न ध्वनेरन्यत्रान्तर्भावः । इतश्च नान्तर्भावः; यतः काव्य-
विशेषोऽङ्गी ध्वनिरिति कथितः । तस्य पुनरङ्गानि-अलङ्कारा गुणा
वृत्तयश्चेति प्रतिपादयिष्यन्ते । न चावयव एव पृथग्भूतोऽवयवीति
है, (वहाँ) ध्वनि नहीं है। जहाँ शब्द और अर्थ व्यङ्ग्य के प्रति तत्पर होकर ही
स्थित हों उसी को संकर रहित ध्वनि का विषय मानना चाहिये ।
इसलिये ध्वनि का अन्यत्र अन्तर्भाव नहीं है। और इस कारण भी अन्तर्भाव
नहीं है, क्योंकि ध्वनि को काव्य विशेष रूप अङ्गी कहा है। उसके अङ्ग-अलङ्कार, गुण
और वृत्तियाँ-प्रतिपादन किये जायेंगे । न कि अवयव ही पृथग्भूत होकर अवयवी के
रूप में प्रसिद्ध है। पृथग्भाव न होने पर भी उस (अलङ्कारादि) का उस (ध्वनि) का
लोचनम्
प्रतीतौ वाच्येन समप्राधान्येऽस्फुटे प्राधान्ये च । क तर्ह्यसावित्याह-तत्परा-
वेवेति । सङ्करेणालङ्कारानुपवेशसम्भावनया उज्झित इत्यर्थः । सङ्करालङ्कारेणेति
त्वसत्, अन्यालङ्कारोपलक्षणत्वे हि क्लिष्टं स्यात् । इतश्चेति । न केवलमन्योन्य-
विरुद्धवाच्यवाचकभावव्यङ्ग्यव्यञ्जकभावसमाश्रयत्वान्न तादात्म्यमलङ्काराणां
ध्वनेश्च यावत्स्वामिभृत्यवदङ्गिरूपाङ्गरूपयोर्विरोधादित्यर्थः । अवयव इति ।
एकैक इत्यर्थः । तदाह-पृथग्भूत इति । अथ पृथग्भूतस्तथा मा भूत्, समुदाय-
होने पर । तब वह कहाँ होता है ? इस प्रश्न पर कहते हैं-तत्पर होकर ही- ।
सङ्कर से अर्थात् (समासोक्ति आदि) अलङ्कार के अनुप्रवेश की सम्भावना से रहित ।
'सङ्करालङ्कार' से यह व्याख्यान असत् है, क्योंकि दूसरे अलङ्कारों को उपलक्षण
मानने पर व्याख्यान क्लिष्ट हो जायगा । और इस कारण भी- । अर्थात् न केवल
अलङ्कारों का और ध्वनि का परस्पर विरुद्ध वाच्यवाचकभाव और व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव
के कारण तादात्म्य¹ (एकरूपता) नहीं, बल्कि स्वामी और भृत्य की भाँति अङ्गीरूप
और अङ्गरूप के विरोध के कारण भी (तादात्म्य) नहीं है। अवयव- । अर्थात् एक-
एक । इस लिए कहते हैं-पृथग्भूत²-। अगर उस प्रकार पृथग्भूत मत हो, समुदाय के
१. 'ध्वनि' सर्वथा अलङ्कारों से अतिरिक्त है। दोनों का तादात्म्य या एकरूपता किसा प्रकार
सम्भव नहीं । इसीलिए वृत्तिग्रन्थ के परिकर श्लोक में ध्वनि के विषय को 'सङ्करोज्झित' कहा है ।
अर्थात् समासोक्ति आदि उक्त अलङ्कारों में ध्वनि के सङ्कर अर्थात् अनुप्रवेश की सम्भावना नहीं
है । अलङ्कार वाच्यवाचकभाव पर आश्रित होते हैं और ध्वनि व्यंग्य-व्यञ्जकभाव पर आश्रित है,
केवल यही कारण नहीं कि दोनों का तादात्म्य सम्भव नहीं, बल्कि स्वामी और भृत्य की तरह
अङ्गिरूप और अङ्गरूप होने के कारण भी विरोध है अतः उन दोनों में तादात्म्य नहीं है । ध्वनि
काव्यविशेष होने के कारण अङ्गी है और अलङ्कार, गुग तथा वृत्तियाँ उसके अङ्ग हैं।
२. यहाँ अलङ्कार आदि को ध्वनि के अङ्ग या अवयव कहने पर यह-शङ्का उठ खड़ी हुई कि

प्रथम उद्योतः १३७
ध्वन्यालोकः
प्रसिद्धः । अपृथग्भावे तु तदङ्गत्त्वं तस्य । न तु तत्त्वमेव । यत्रापि
वा तत्त्वं तत्रापि ध्वनेर्महाविषयत्वान्न तन्निष्ठत्वमेव । 'सूरिभिः कथित'
अङ्ग होना है, न कि अङ्गी ही होना। जहाँ कहीं भी अङ्गी होना है वहाँ भी ध्वनि
के महाविषय होने के कारण उन ( अलङ्कार आदि ) में अन्तर्भाव नहीं है । 'सूरियों ने
लोचनम्
मध्यनिपतितस्तर्ह्यस्तु तथेत्याशङ्कयाह—अपृथग्भावे त्विति । तदापि न स
एक एव समुदायः, अन्येषामपि समुदायिनां तत्र भावात्; तत्समुदायिमध्ये
च प्रतीयमानमप्यस्ति, न च तदलङ्काररूपं, प्रधानत्वादेव । तत्त्वलङ्काररूपं
तदप्रधानत्वान्न ध्वनिः । तदाह—न तु तत्त्वमेवेति । नन्वलङ्कार एव कश्चित्त्वया
प्रधानताभिषेकं दत्त्वा ध्वनिरित्यात्मेति चोक्त इत्याशङ्कयाह—यत्रापि वेति ।
न हि समासोक्त्यादीनामन्यतम एवासौ तथास्माभिः कृतः, तद्विविक्तत्वेऽपि
तस्य भावात्, समासोक्त्याद्यलङ्कारस्वरूपस्य समस्तस्याभावेऽपि तस्य
दर्शितत्वात् 'अत्ता एत्थ' इति 'कस्स वा ण' इत्यादि; तदाह-न तन्निष्ठत्वमेवेति ।
बीच रहे, यह आशङ्का करके कहते हैं—पृथग्भाव न होने पर— । तब भी वह
एक ही समुदाय नहीं है, अन्य समुदायियों का भी वहाँ अस्तित्व है । और समुदायियों
के बीच में प्रतीयमान भी है, न कि वह अलङ्कार रूप है, क्योंकि वह प्रधान है ।
जो कि अलङ्कार रूप है वह अप्रधान होने के कारण ध्वनि नहीं है । इस लिए कहा—
न कि अङ्गी ही होना— । किसी अलङ्कार ही को तुमने प्रधानता का अभिषेक देकर
‘ध्वनि’ और ‘आत्मा’ कहा है, यह आशङ्का करके कहते हैं—जहाँ कहीं भी— । न
कि यह ध्वनि समासोक्ति आदि अलङ्कार में कोई अन्यतम है जिसे उस प्रकार हमने
किया है, क्योंकि समासोक्ति आदि के अभाव में भी उस ( ध्वनि ) का अस्तित्व है ।
समासोक्ति आदि अलङ्कार के स्वरूप के समान स्वरूप वाले अलङ्कार के अभाव में भी
उसे ( ध्वनि को ) दिखाया है, 'अत्ता एत्थ०', 'कस्स वा ण०' इत्यादि । इस लिए
अवयव के अतिरिक्त जब कि कोई अवयवी नहीं प्राप्त होता तो क्यों नहीं यह स्वीकार किया
जाय कि अवयवरूप अलङ्कार भी अवयवी ध्वनि हैं ? इसका निराकरण करते हैं कि पृथक्-पृथक् रूप
से अवयव किसी प्रकार अवयवी नहीं बन सकता, अर्थात् एक-एक अवयव को लेकर उसे अवयवी
की संज्ञा नहीं दी जा सकती । इस पर पुनः शङ्का होती है कि क्यों नहीं तब समुदायमध्यपतित
अवयव को ही अवयवी कहते हैं ? इसके निराकरण में लोचनकार का स्पष्टीकरण यह है कि
समुदाय किसी प्रकार एक को नहीं कहते हैं, क्योंकि समुदायी में अनेक और भी समुदायियों का
अस्तित्व होता है जैसे कि प्रस्तुत में ही प्रतीयमान भी एक समुदायी है, वह अपनी प्रधानता की
स्थिति में ‘ध्वनि’ हो जाता है । वह अलङ्काररूप अप्रधान होने के कारण होता है । इस प्रकार
न तो पृथक्-पृथक् रूप से अवयव को अवयवी कह सकते हैं और न समुदायरूप से । तात्पर्य यह
कि ‘ध्वनि’ सर्वथा अङ्गी एवं प्रधान तत्त्व है और अलङ्कार आदि अङ्ग या अप्रधान हैं । इसी अंश
में अलङ्कार आदि ध्वनि के अङ्ग हैं कि वह काव्यविशेष है और अलङ्कार आदि उसमें रहा करते
हैं, न कि वह ध्वनि स्वयं अलङ्कार आदि में अन्तर्भुक्त हो सकता है ।

१३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
इति विद्वदुपज्ञेयमुक्तिः, न तु यथाकथञ्चित्प्रवृत्तेति प्रतिपाद्यते । प्रथमे
हि विद्वांसो वैयाकरणाः, व्याकरणमूलत्वात्सर्वविद्यानाम् । ते च
श्रूयमाणेषु वर्णेषु ध्वनिरिति व्यवहरन्ति ।
कहा है' अर्थात् यह उक्ति विद्वानों के मतानुसार (विद्वदुपज्ञा) है, न कि जिस
किसी प्रकार चल पड़ी है, कि इसे प्रतिपादन कर रहे हैं। मुख्य विद्वान् वैयाकरण हैं,
क्योंकि समस्त विद्याओं का मूल व्याकरण है। वे (वैयाकरण विद्वान्) श्रूयमाण वर्णों
में 'ध्वनि' यह व्यवहार करते हैं।
लोचनम्
विद्वदुपज्ञेति । विद्वांस उपज्ञा प्रथम उपक्रमो यस्या उक्तेरिति बहुव्रीहिः। तेन
'उपज्ञोपक्रमम्' इति तत्पुरुषाश्रयं नपुंसकत्वं निरवकाशम् । श्रूयमाणेष्विति ।
श्रोत्रशष्कुलीं सन्तानेनागता अन्त्याः शब्दाः श्रूयन्त इति प्रक्रियायां शब्दजाः
शब्दाः श्रूयमाणा इत्युक्तम् । तेषां घण्टानुरणनरूपत्वं तावदस्ति; ते च ध्वनि-
शब्देनोक्ताः । यथाह भगवान् भर्तृहरिः—
कहा—उसमें अन्तर्भाव नहीं है—। विद्वदुपज्ञा—। विद्वानों से उपज्ञा अर्थात् सबसे
पहले उपक्रम (आरम्भ) है जिस उक्ति का—यह बहुव्रीहि है। इस लिए 'उपज्ञोपक्रमं
तदाद्याचिख्यासायाम्' (पा. सू. २. ४. २१) इसके अनुसार तत्पुरुष में होने वाले
नपुंसकत्व का कोई अवसर नहीं। श्रूयमाण¹—। शष्कुली सदृश श्रोत्रदेश के आकाश
में सन्तानक्रम से (वीचीतरङ्ग की भाँति) आकर अन्त वाले शब्द सुने जाते हैं, इस
प्रक्रिया में शब्द से उत्पन्न शब्द 'श्रूयमाण' होते हैं, यह कहा गया है। उन (श्रूयमाण
अन्त्य शब्दज शब्दों) का घण्टानुरणन का सादृश्य है। वे 'ध्वनि' शब्द से कहे गये हैं।
जैसा कि भगवान् भर्तृहरि ने कहा है—
१. प्रस्तुत में विषय के स्पष्टीकरण के लिए संक्षेप में 'स्फोट' के स्वरूप को जान लेना आवश्यक
है। स्फोटवाद भारतीय वैयाकरणों की निजी कल्पना है। अलङ्कारशास्त्र में 'ध्वनि' की कल्पना का
आधार व्याकरणों का स्फोट-सिद्धान्त ही है। 'स्फोट' का अर्थ है जिससे अर्थ का स्फुटन होता हो
(स्फुटत्यस्मादर्थ इति स्फोटः)। इस 'स्फोट' को भी समझने के पूर्व हमें शब्द-श्रवण की प्रक्रिया से
परिचित होना चाहिए। शब्द की उत्पत्ति तीन प्रकार से होती है—संयोग से, वियोग से एवं
शब्द से। इस प्रकार उत्पत्ति के अनुसार शब्द तीन प्रकार के हैं—संयोगज, वियोगज (या
विभागज) और शब्दज। किसी वस्तु का किसी वस्तु के साथ जोर से संयोग होने पर भी शब्द
उत्पन्न होता है और कागज या किसी वस्तु के विभाग में भी शब्द उत्पन्न होता है। इसी प्रकार
जिह्वा आदि के संयोग-वियोग द्वारा भी शब्द की उत्पत्ति होती है। मूलतः उत्पन्न शब्द 'स्फोट'
कहलाता है। किन्तु जो शब्द उत्पन्न होता है वही श्रोता को नहीं सुन पड़ता है। जैसे कुछ दूरी
पर बैठ कर जो कोई बोलता है वही शब्द श्रोता को सुनाई नहीं देता बल्कि वह उत्पन्न होकर
नष्ट हो जाता है और अपने नष्ट होने के पूर्व दूसरे शब्द को उत्पन्न कर देता है, इसी प्रकार
दूसरा शब्द तीसरे शब्द को, तीसरा चौथे को एवं चौथा पांचवे को आदि। इसको 'वीचीसन्तान-
न्याय' कहते हैं। अर्थात् जैसे सरोवर के स्थिर जल में ठिकरा डालने पर एक वर्तुलाकार छोटा

प्रथम उद्योतः १३९
लोचनम्
यः संयोगवियोगाभ्यां करणैरुपजन्यते ।
स स्फोटः शब्दजाश्शब्दा ध्वनयोऽन्यैरुदाहृताः ॥ इति ।
एवं घण्टादिनिह्रादस्थानीयोऽनुरणनात्मोपलक्षितो व्यङ्ग्योऽप्यर्थो ध्वनि-
रिति व्यवहृतः । तथा श्रूयमाणा ये वर्णा नादशब्दवाच्या अन्त्यबुद्धिनिर्ग्राह्य-
स्फोटाभिव्यञ्जकास्ते ध्वनिशब्देनोक्ताः । यथाह भगवान् स एव—
‘करणों अर्थात् जिह्वादि स्थानों के साथ संयोग और वियोग के कारण जो उत्पन्न
होता है वह ‘स्फोट’ है और (श्रूयमाण) शब्दों से उत्पन्न शब्दों को अन्यों (उत्पत्ति
वादियों) ने ‘ध्वनि’ कहा है ।’
इस प्रकार घण्टा आदि की आवाज के समान अनुरणनरूपोपलक्षित व्यंग्य अर्थ
‘ध्वनि’ के नाम से व्यवहृत है । तथा श्रूयमाण जो ‘नाद’ शब्दवाच्य एवं अन्तिम बुद्धि
से नितरां ग्राह्य स्फोट को व्यञ्जित करनेवाले जो वर्ण हैं वे ‘ध्वनि’ शब्द से कहे गए हैं ।
जैसा कि उन्हीं भगवान् भर्तृहरि ने कहा है—
सा घेरा पैदा हो जाता है, वही एक से दूसरी तरंग को उत्पन्न करते हुए समस्त सरोवर में व्याप्त
हो जाता है । इसी प्रकार शब्द से उत्पन्न शब्द घण्टानुरणन रूप होने के कारण ‘ध्वनि’ कहलाते
हैं । भर्तृहरि की यह कारिका इसी अभिप्राय को व्यक्त करती है—
यः संयोगवियोगाभ्यां करणैरुपजन्यते ।
स स्फोटः शब्दजाः शब्दा ध्वनयोऽन्यैरुदाहृताः ॥
यह भी कल्पना है कि ‘स्फोट’ एक नित्य शब्द के रूप में हमारे मन में विद्यमान रहता है ।
हम जिस अनित्य शब्द को सुनते हैं उससे उस नित्य ‘स्फोट’ रूप शब्द का उद्बोध होता है और
उसके द्वारा हम अर्थ का ज्ञान करते हैं । वर्णस्फोट, पदस्फोट, वाक्यस्फोट आदि भेद भी हैं ।
घण्टा के एक बार बज जाने के बाद उसमें जिस प्रकार ध्वनि रूप अनुरणन होता है उसी
प्रकार अनुरणन रूप से उपलक्षित व्यङ्ग्य अर्थ भी अलङ्कार-शास्त्र में ‘ध्वनि’ कहा गया है । इस
प्रकार वैयाकरणों के ‘ध्वनि’ को अनुरणनरूपता के आधार पर आलङ्कारिकों ने अपने
अनुरूप बना लिया ।
केवल व्यङ्ग्य अर्थ ही ‘ध्वनि’ नहीं बल्कि ‘व्यञ्जक’ भी ‘ध्वनि’ कहा जाता है । इस प्रकार
व्यञ्जक होने के कारण वाचक शब्द और वाच्य अर्थ भी ‘ध्वनि’ पद से वाच्य होते हैं । इस
मन्तव्य को सिद्ध करने के लिए वैयाकरणों के ‘नाद’ को लिया है । ‘नाद’ श्रूयमाण वर्णों को
कहते हैं । जिस क्रम से वर्ण श्रूयमाण होते हैं उसी क्रम से ‘स्फोट’ रूप नित्य शब्द की अभिव्यक्ति
होती है । जैसे हमने ‘घट’ शब्द को सुना तो ‘घ्’ के पश्चात् ‘अ’ तब ‘ट्’ और तब ‘अ’ की हमें
प्रतीति होती है । पूर्व वर्ण उत्पन्न होकर अपना संस्कार उत्पन्न करके अग्रिम वर्ण के उत्पन्न होते
ही नष्ट हो जाता है । नैयायिक लोग इसे वर्णों का नाश मानते हैं, किन्तु वैयाकरण लोग इसे
‘तिरोभाव’ कहते हैं । इस प्रकार ‘स्फोट’ को पूर्व-पूर्व वर्ण के अनुभव से उत्पन्न संस्कार के सहयोग
से, जो हमें अन्त्य वर्ण की बुद्धि होती है उसके द्वारा ग्रहण करते हैं । इस प्रकार ‘स्फोट’ रूप
नित्य शब्द के ये वर्ण अभिव्यञ्जक होने के कारण ‘ध्वनि’ कहे जाते हैं । भर्तृहरि ने इसे इन
शब्दों में कहा है—
प्रत्ययैरनुपाख्येयैर्ग्रहणानुगुणैस्तथा ।
ध्वनिप्रकाशिते शब्दे स्वरूपमवधार्यते ॥

१४० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
प्रत्ययैरनुपाख्येयैर्ग्रहणानुगुणैस्तथा ।
ध्वनिप्रकाशिते शब्दे स्वरूपमवधार्यते ॥ इति ।
तेन व्यञ्जकौ शब्दार्थावपीह ध्वनिशब्देनोक्तौ । किञ्च वर्णेषु तावन्मात्रपरि-
माणेष्वपि सत्सु । यथोक्तम्—
अल्पीयसापि यत्नेन शब्दमुच्चारितं मतिः ।
यदि वा नैव गृह्णाति वर्णं वा सकलं स्फुटम् ॥ इति ।
तेषु तावत्स्वेव श्रूयमाणेषु वक्तुर्योऽन्यो द्रुतविलम्बितादिवृत्तिभेदात्मा प्रसि-
द्धादुच्चारणव्यापादभ्यधिकः स ध्वनिरुक्तः । यदाह स एव—
शब्दस्योर्ध्वमभिव्यक्तेर्वृत्तिभेदे तु वैकृताः ।
ध्वनयः समुपोहन्ते स्फोटात्मा तैर्न भिद्यते ॥ इति ।
‘अनिर्वचनीय एवं व्यक्तरूप स्फोट के ग्रहण के अनुकूल प्रत्ययों से उस शब्द में, जो
ध्वनियों द्वारा प्रकाशित होता है, स्फोट का स्वरूप ज्ञात होता है ।’
इसलिए व्यञ्जक शब्द और अर्थ को भी ‘ध्वनि’ शब्द से कहा है । और भी, जिस
रूप से श्रोत्रेन्दिय द्वारा गृहीत होते हैं उस परिमाण के वर्णों में भी ( ‘ध्वनि’ शब्द से
व्यवहार होता है) । जैसा कि कहा है—
मति थोड़े भी प्रयत्न से उच्चरित शब्द को नहीं ग्रहण करती है, यदि वा सकल वर्ण
को स्फुटरूप से ग्रहण कर लेती है ।
उतने ही अंश में श्रूयमाण वर्णों में वक्ता का जो अन्य द्रुत, विलम्बित आदि
वृत्ति भेद रूप प्रसिद्ध उच्चारण व्यापार से अधिक है वह ‘ध्वनि’ कहा गया है । जो कि
उन्होंने ही कहा है—
‘( स्फोटरूप ) शब्द की अभिव्यक्ति के पहले जो वैकृत शब्द ( द्रुत आदि ) वृत्तियों
के भेद में ‘ध्वनि’ मालूम पड़ते हैं, स्फोट उनसे भिन्न नहीं होता ।’
अर्थात् अनिर्वचनीय, व्यक्तरूप स्फोट के ग्रहण के अनुकूल, प्रत्ययों से उस शब्द में, जो
ध्वनियों द्वारा प्रकाशित होता है, स्फोट का स्वरूप ज्ञात होता है। मतलब यह कि जो शब्द
श्रूयमाण वर्ण रूप ध्वनियों से ग्रहण के अनुकूल, अनिर्वचनीय प्रत्ययों द्वारा प्रकाशित होता है उसे
ही ‘स्फोट’ का स्वरूप अवधारण किया जाता है । इस प्रकार जब वैयाकरणों ने ‘व्यञ्जक’ को ‘ध्वनि’
माना तब आलंकारिकों ने उसी समानता पर व्यञ्जक शब्द और अर्थ को भी अपने यहाँ ‘ध्वनि’
कहा। यहाँ तक ‘ध्वनि’ को लेकर व्यङ्ग्य अर्थ, व्यञ्जक शब्द और व्यञ्जक अर्थ को ‘ध्वनि’ कहने
की प्रवृत्ति की चर्चा हुई ।
अब व्यञ्जकत्व रूप व्यापार को ‘ध्वनि’ कहने की प्रवृत्ति किस आधार पर है, इसे स्पष्ट करते
हैं । वैयाकरणों के अनुसार जिन वर्णों का हम उच्चारण करते हैं उसकी अभिव्यक्ति में द्रुत एवं विलम्बित
आदि प्रकारों से अन्तर पड़ जाता है । अर्थात् हम कभी धीरे धीरे और कभी शीघ्र उच्चारण करते
हैं । इस प्रकार शब्द में अन्तर होते हुए भी अर्थ में अन्तर नहीं होता । वैयाकरणों ने शब्द के
दो रूप माने हैं एक प्राकृत दूसरा वैकृत । हम जो उच्चारण करते हैं वे वैकृत शब्द हैं और
प्राकृत शब्द उन वैकृत शब्दों के उच्चारण के बाद उत्पन्न होने वाला नित्य स्फोट रूप शब्द है ।
द्रुत, विलम्बित आदि वृत्तियाँ या स्वरभेद वैकृत शब्दों में हुआ करते हैं । इस प्रकार वक्ता की